तू मुझमें बलखाती है,
जैसे मुड़ी हो पहाड़ पर राहें कोई,
तू मुझमें उमड़ती है,
जैसे सागर में उफनती हो लहरे कोई,
तू मुझमें इठलाती है,
जैसे प्रवाहित नदी जल अपना छलकाती है,
तू मुझ में मचलाती है,
जैसे कली छूने को अलि मचले,
तू मुझमें शांत है,
जैसे उपर से समंदर...
फिर क्या हुआ ऐसा,
कि तू मुझमें अब बलखाती नही,
बता मुझे मुड़ी राहों से तू किस ओर मुड़ी,
वही छोर पर खड़ी-खड़ी निगाह मेरी थकी,
उफनती हुई तो देखा मैने तुम्हे,
लहरों सी नहीं दावानल हां!
ये तो है कि तू मुझमें इठलाती है,
पर तीक्ष्ण प्रवाह से अपने,
मन की दरारों को मेरी गहरा कर जाती है,
हां! थी मेरे मन की गंगा श्वेत निर्मल स्वच्छ,
पर क्यों मलिन हुई मन से मेरे,
भरी थी जीवन में मैने तो मिठास,
बनकर अलि कली स्पर्शन का,
फिर क्यों तूने फैला दी,
यहां कैसी खटास,
नही है शांत कुछ,
समंदर सी तो नही हालत मेरी,
होगी कैसी हालत तेरी,
आदत बताई थी जो तुमने लापरवाह मेरी,
अब क्यों करे हम परवाह तेरी....
"इन्द्राज योगी"


