छल छ्लावे से छला गया,दया करुणा से ठगा गया,
सोने की चिड़िया था मेरा भारत,हाथ फैला कर ठगा गया...
खुशी-प्रेम का आवरण था,मेल-जोल का वातावरण था,
साथ-साथ रह्ते थे सब,दिलों मे एक-दुसरे के बसते थे...
अमन चैन कायम था, कायम था हर व्यक्ति अपनी जुबान पर,
दुख की कोई छटा ना थी,किसी के सुरत पर...
भारतवर्ष-सा देश मेरा,खुशहाली-भाईचारे का प्रतीक था,
एक-दुसरे के लिए मरे-जीते,ऐसा बन्धुत्व का प्रतीक था...
साथ दिलों से दिवाली थी,गले मिल जाते तो ईद थी,
रंग-बिरंगे चेहरे होली को दर्शाते थे...
त्योहारों की सौगात थी,इसी बहाने खुशियों की बरसात थी,
यह श्रीराम-कृष्ण की भूमि,मर्यादित जीवन जीना सिखाती थी...
यंहा अमीर खुसरो भी श्री कृष्णम शरणम् मम गाता था,
धर्म की कोई सरहद ना थी,मिलकर त्योहार मनाते थे...
आती विपत्ति देश पर,मिलकर सुझाव बतियाते थे,
भारत माता के वीर सपूत,मिलकर बोझ उठाते थे...
एकता और प्रेम का गहरा नाता था,मिलकर बुना ऐसा बाना था,
सिर्फ एक ही रंग दिखलाता था,जो मेरा भारत महान की गाथा गाता था...
शायद यह किसी की आंखों मे खटक रहा था,
समय की मार देखो,काल की हार देखो,
लगी किसी की बुरी नजर,शायद सोने की चिड़ियाँ लुटने वाली थी...
रंग गोरे थे जिनके,इरादे उतने ही काले थे,
भरे पड़े खजानो को लुटने, डेरे डाले थे...
हाथ फैलाए दया का दिया वास्ता,हम थे दया-करुणा के व्यापारी,
मन मे हमारे सच्ची आस्था,कपट से भरी थी दुनियादारी...
अंगुली-अंगुली पकडते,उन्होने बाजू धर दबोचा था,
थोड़े-थोड़े करते-करते,बहुत कुछ उन्होने सोचा था...
ईस्ट इंडिया-सा ढोंग रचाया,लुटने भारत माँ की अस्मत,
भारत के लोगो पर,अत्याचार का बनाया मत...
देखो हमारी भारत माता पर,अपना अधिकार जता रहे थे,
देखो जो कुछ दिन पहले,दोनो हाथ फैलाए थे...
चाबुक-सा मारे कोडे,अन्तिम स्वांस तक वो ना छोड़े,
मेरी धरती-मेरा देश ,मरते दम तक हम ना छोड़े...
बद नियत फिरंगियों ने ऐसा खेल रचाया था,
हम मदारियों को ही बन्दर बना नचाया था...
कोहिनूर से भी कीमती,देशवासियों को कोल्हू बनाया जाता था,
थकान से चुर होने पर भी,चाबुक मारा जाता था...
अंग्रेजो की नीति ने,सम्पूर्ण कब्जाया था,
जुल्म की यह आँधी देख,वीरों के मन मे तुफान-सा जलजला उठ रहा था,
भारत माता पर हो रहे जुल्म,यह देख शीश झुक रहा था...
मन मे जली आजादी की लौ,गुलाम से उचित था मर जाना,
हो आजाद मेरी भारत माता,हाँ ऐसा कुछ कर जाना...
आजादी की आग, त्वरित गति से फैलाई,
आये कई जद मे,वीर सपूतो ने क्रांती जगाई...
महात्मा भी तो रघु पति राघव राजा राम गाता था,
हिन्द-ए-केसरी क्रांती की लौ मे,इंकलाब दोहराता था,
इकबाल भी तो,सारे जहां से अच्छा,हिंदोस्तां हमारा गुनगुनाता था...
भारत माता का कर उध्घोष,इंकलाब जय गुजाई,
शरीर पर झेल गोलियाँ,महान क्रांति मे भुमिका निभाई..
हो अब आजाद देश मेरा,मन संकल्प मे यह ठाना,
हाथ मे थाम तलवार,पहना केसरिया बाना...
फिरंगी गोलियों के सामने,वीर सपूतो का सीना था,
तोप के दहाने का मुख,भारत माँ के शेरो पर ताना था...
अपने उपकरणो को हथियार बना,मन आजाद तन योद्धा सा ढाला था,
करू सामना करू खात्मा,ऐसा उत्साह मन उठाया था...
खुन के बदले खुन हो,अहिंसा परमो धर्म:,
दो सिध्दांतों पर देश बंटा था,पर लक्ष्य आजादी था...
कर्तव्य पथ पर चलते हुए,ऐसा महान दायित्व संभाला,
हसते-हसते चढ़ गये फंदे,अपना फर्ज निभाया...
लाखों वीरों की आहुति थी, युध्दरुपी इस महान यज्ञ मे,
आजादी के लिए किसी ने, ना खेली ऐसी होली थी जग मे...
संप्रभुता को ठेस पहुचा,हमारी एकता से खेला था,
जाते-जाते अंग्रेजो ने ,अपनी सोच से छला था...
फुट डालो के सिद्धांत पर,उन्होने अमल पाया था,
मेरे भोले, देश पर इसका कहर ढाया था...
जाति-भेद की बोई फसल,गले काट कटवाया था,
हिन्दू-मुस्लिम की खींच लकीर,आपस मे भिड़वाया था..
सफेद पोशाक के दरिन्दो ने,खुशहाल भारत उजड़वाया था,
घर-आँगन था जिनका एक,दहलीज़ पर लड़वाया था,
मन्दिर-मस्जिद को बना के पहलू,नित-नित रक्त बहाया था...
हां हम आजाद हुए,मन से मुक्ति ना मिल पाई,
आजादी का सही भाव,अभी तक आत्मा समझ ना पाई...
आजादी मे रंगने का,एक ही पल क्यों खास हो,
हर एक सोच राष्ट्र निर्माण की, अब आजादी की आश हो...
करो मन मे दृढ़-संकल्प,
कि अब ना कोई शत्रु आ ना पाये..
देश की अस्मता को नीलाम ना कर पाये,
अब ना कोई देश की एकता,अखण्डता,सौहार्द से ना खेल पाये...
पहुचा ना पाये, भारत माता की आत्मा को ठेस,
भाईचारे की राह थाम,हर कठिन हो बाधा आम..
जगतगुरु,सोने की चिड़ियाँ बने हिंदुस्तान हमारा,
हो स्वतंत्रता असली मायनो मे साकार...
बने भरत का भारतवर्ष महान,हो विश्व मे यह गान,
मेरा भारत महान,मेरा भारत महान,मेरा भारत महान...
"इन्द्राज योगी"


