सुनो तुम उत्तराखण्ड की वादियों सी सुहानी,
या मेरे ख्वाबों में स्थिर तटस्थ हो पहाड़ों सी,
महसूस करती है हो खुद को,
गहरी-गहरी खाईयों सी,
या फिर बहती हो शीतल निर्मल,
मेरे मन में मेरी उमंग में झरनों सी...
मैं चाहता हूं तुम्हारे संग हिमखंडों सा पिघलना,
छल छल बल खाकर झरना सा बहना,
गिरि हिमांचल पर तुहिर सा जमना,
चिनार देवदार सा स्थिर स्थित रहना,
टेडी मेड़ी राहों सा तुझमें उलझना,
और होना चाहता हूं निर्मल गंगा सा उद्गम संगम,
हां बस होना चाहता हूं मैं तुझ संग उत्तर आखंड्म...
"इन्द्राज योगी"


