श्रीराम ने पतंग उड़ाई,

इंद्रलोक में जा टकराई,

बालवस्था की अलौकिक कहानी,

सब जन सुनो अब मेरी जुबानी....


बालवस्था प्राप्त चारों कुमार,

चल पड़े चंग ले,

पतंग उड़ाने का कर विचार,

हर्षा रहे मुस्का रहे,

मन ही मन इठला रहे....


उठा मिट्टी मुष्ठिका में किया,

पवन का दिशा ज्ञान,

मध्य भाग को बांध कर,

उन्मुक्त व्योम में पतंग दिया तान....


चारों कुमार हर्षाते,

उछल कूद खुशी बिताते,

दे सूत को और बढ़ावा,

करते नभ से छलावा....


पतंग जा स्वर्ग टकराई,

इन्द्र पुत्र जयंत की दृष्टि चकराई,

पतंग अलौकिक यह,

जिसने भी स्वर्ग तक पहुंचाई....


हताश मन निराश,

अटकी पतंग,

कुमार सभी निराश....


अवध घूमता मदारी आया,

संग प्यारा सा छोटा कपि लाया,

उछल-उछल कर खेल दिखाए,

बजा करताल सब कुमार मुस्कराए....


लेकिन एक कुमार,

जो अभी तक थे निराश,

मदारी ने हाल पहचाना,

कपि ने स्वर्ग तक मन ही मन में जाने का ठाना....


पकड़ सूत करि कपि चड़ाई,

क्षणभर में ही पतंग छुड़ाई,

जयंत राज को दे चकमा,

कपि क्षण भर में ही अवध आ धमका....


कुमार ने कपि शीश सहलाया,

स्नेह पुरित कर बढ़ाया,

कपि नैनो से अश्रु बहे,

हरि ने हरि को हरि से मिलाया....


कर व्यक्त कृतज्ञता मदारी से,

करने लगे अरदास कुमार,

कपि यह अलौकिक,

सम्पूर्ण ज्ञान इसे भौतिक,


रखु मैं अपने पास इसे,

दूंगा अनंतम प्यार इसे,

मन बहलाने को नहीं,

रखू प्रियतम मित्र भांति इसे....


मदारी ने अधरों पर मुस्कान सजाई,

बात बहुत सजह रघुराई,

आएंगे जब संकट जीवन आपके,

कपि को पाओगे समक्ष आपके....


ले अवध से विदाई,

मदारी कपि कुछ दूर चले,

क्षण भर में हुए दृष्टि ओझल,

तकती निगाहों को कर बोझिल....


हे प्रभु महान हो आप,

महान आपकी लीला,

मेरे प्रभु से मिलाप करवाया,

स्वयं मदारी रूप धराया....

" इन्द्राज योगी "