विधि का यह विधान रखे,सबको समान,
करें प्रत्यत्न श्रेष्ठ का,समाज में पाए वह सम्मान,
व्यक्ति-व्यक्ति मिल किया निर्माण,समाज का,
जी सके अपने मुताबिक,
किया निर्माण स्वाभिमान का....
जन्म दिया ब्रह्मा ने,
रचा समाज इंसान ने,
है कृति समाज मनुष्य की,
मनुष्य कृति ब्रह्मा की....
जीवन का संबंध अटूट,
समाज के हर बंधन से,
कहा कब तक पीछा छुड़वाए,
समाज के हर गठबंधन से....
है खतरे में रहे सदा,
कर जाता कोई भी बदनाम इसे,
है आबरू इसकी शिथिल,
रहता भय है सदा इज्जत का इसे....
अनेकों कुप्रथाओं से जड़ा,
है स्थापित,विभिन्न स्थानों पर,
होगा कहीं ही खुशहाल,
है ही अंदेशा शायद यही....
पुरातन का वार,
रहा सदा प्रबलकारी इस पर,
कन्या वध का भार सहे,
खुशहाल कहां रहे हो जिस पर....
औरत जहां रही सदा शोषित,
थे पथ-पथ पर दमनकारी,
जन्म से लेकर मृत्यु तक,
थी मृत्यु कई रूपों में हमारी....
था शर्मिंदा देख यह,
देते थे नाम समाज जिसे,
नाम ले ले कर बदनामी का,
उड़ाते थे धज्जियां इसकी....
हां मैं समाज हूं,
हां मैं वही समाज हूं,
सती प्रथा में,
मृदुल कोमल-सी बेटियों को,
मैंने जलाया,
क्या करता,
करता भी क्या,
था ऐसों ने ही मुझे बनाया....
मेरे स्वामीकारों ने दिया,
मनुष्य को रूप कई,
भेजा स्वयं प्रभु ने,
जिसे,जन्म एक रंग कई....
फिर किसने यहां,
ऊंच-नीच की आग लगाई,
है जिसके शक्तियां वश में,
निर्बल को दास बनाएं....
बेटियों का मोल,
इसी समाज ने किया है,
अमूल्य-सी इन बेटियों को,
दहेज में तोला है....
कहता,डरता रहा,
समाज तब भी,
परंतु कोई लगाम ना,
कस पाया अब भी,
होती है बेटियों की नीलामी,
इस समाज में अब भी....
अरे था नहीं जिस वक्त,
करने को गुजारा कोई,
लगा अनेकों कर तुमने,
दबाया मारने को जैसे,
गला कोई....
समाज भी अवस्थाओं में बंटा,
नवजात था,अबोध था,
जब हुआ किशोर,
दिखाया अपना प्रभाव था....
विधवा के बोझ तले,
दबी वह सह रही,
दिल में अपने दबाए बैठी,
संझोएं जो अरमान सभी....
फिर भी दिल नहीं पिघला,
जालिम उस समाज का,
दिया दुख,
ज़ुल्म की सीमा पार कर....
शीश से छीन लीनी खूबसूरती,
दिया रहने को कोना,
मिट्टी का बिछौना,
सारी उम्र का रोना....
हां समाज तू,
बदनाम ही रहा,
थे,तेरे रक्षक बदनियत,
रखता कौन तुझे सहज संभाले,
नहीं थी किसी को तेरी सहूलियत....
उपाय था,पर्दा,
सुरक्षित करने को आक्रमणकारियों से,
दे दिया उसे,
जीवन की एक परंपरा का रूप....
समझते अपना जो मान,
पर्दा प्रथा-सी कुप्रथा में,
नहीं विश्वास खुद को क्या,
या समझते हो क्या,
स्वयं आक्रमणकारी सा....
देखने भी तो दो,
दुनिया रंग बिरंगी,
खुली आंखों से....
क्या दिखता होगा,सोचो,
या लगा कर देखो,
पर्दे-सा झरोखा....
ऐसा समाज कैसे होगा,
प्रगतिशील,
जहां पग-पग पर फैली,
कुप्रथाएं....
दमन करो इन कुप्रथाओं का,
बनाओ एक शिक्षित,खुशहाल समाज,
जहां रहे औरतें विमुक्त,
कुप्रथाओं के बंधन से,
होगा विकास का आगमन,
इन्हीं के अभिनंदन से....
"इन्द्राज योगी"


