।।1।।
घने गहन वन मे,एक कन्या नवजात,
देख के चारों ओर,रूदन करे बिन मातृ-तात..
सुरमय नयन,कान्तियुक्त आभा मुख-मण्डल पर,
सिसक-सिसक के औष्ठ कपकपाए,बहे अश्रुधारा कपोलौ पर ....
पक्षियों का था डेरा,चारों ओर उसे था घेरा,
सिंह-व्याघ्र लगाएं दहाड़,चारों ओर लगाएं फेरा....
।।2।।
विचरण करते महर्षि,गुजरे उस वन के मार्ग,
दृष्टी पडी जब नवजात,उठा लिया बाहों मे बढा के दोनो हाथ..
दिव्य दृष्टी से ज्ञात हुआ,बिछा हुआ था इन्द्र जाल,
तपस्यारत विश्वामित्र को करने भंग,भेजी मृत्युलोक पर अप्सरा एक....
।।3।।
उर्वशी-उर्वशी नाम है मेरा,रुप-यौवन की मैं धनी,
इन्द्र लोक की मैं अप्सरा,देखे मुझे जो आश्चर्यचकित रह जाय,
इन्द्र सभा मेरे कदमो से थिरके,देवता गण सभी मेरे साथ को आतुर....
।।4।।
शापित पुर्व जन्म का भोग ही समझो,मिली सजा जो शायद इस जन्म,
अप्सरा-सी जननी,महर्षि-सा जनक,
हाय!फ़िर भी भाग्य मे लिखा कानन जीवन,
नाम मिला गुरुवर से शकुन्तला विख्यात....
।।5।।
कालान्तर के पक्ष परिवर्तन सदा ही होता आया,
समय बीता,दिन बीते,बीते महीने साल..
शायद कुछ और था,मंजूर महान थी काल की चाल,
एकान्त वन मे पुष्प चुनती,गुरु सेवा ही परमो धर्म,
आत्मजा सम्मान से सुखी गुरु,यही श्रेष्ठ कर्म....
।।6।।
महान नृपति दुष्यंत कुमार,स्वयं चले आखेट को वन मे,
क्रीड़ा का यह एक रुप,दर्शाता था नृप राजकर्म..
दृष्टी पडी मृग पर,साध निशाना तानी प्रत्यंचना,
बाण से बाण,बाण पर बाण,मृग के चतुर चाल से जाते चूक,
अचूक निशानेबाज थे जो,उनका भी निशाना जा रहा था चूक....
।।7।।
अश्व वेग से भी तेज मृग दौडा जाता है,दल-बल से बहुत दूर नृप चला जाता है,
थक-हार देख के चारों ओर,अपनी ग्रीवा घुमाता है..
हो गया मृग दृष्टी से ओझल,किसी अन्य का बोध नही हो पाता है,
निर्जन वन,अंधकारमय रात्रि का साया,
आगौश मे ले लेती सम्पुर्ण वन को अमावस्या की छाया....
।।8।।
वन-वन भटकते-भटकते राजन,पहुचे एक अनुपम-रमणीय स्थल,
देखा एक अद्वितीय एक स्थान,रह गये नेत्र स्थिर दोनो समान..
जामदानी पहने एक कुमारी,चुन रही पुष्प रंग-बिरंगे,
छिप कर झाडियों से देख रहा,यह आकर्षित दृश्य कामुक ....
।।9।।
कुमारी चुन कर पुष्प,एकदम से मुड़ जाती है,
मानो ढस गया हो सर्प,देख के रुप यौवन,
नृप स्तब्ध रह जाता है....
।।10।।
कामयुक्त नेत्र,काले सर्प से केश,
अधरों से मादकता छ्लके,पहने सादा वेश..
माथे पर कुमकुम की बिंदी,नयन सजे अंजन,
होंठो पर गुलाबी लाली,कामुकता की छटा निराली..
मुस्कान भरे जो श्वेत मोती,जैसे प्रतीत होते दन्त,
स्वयं अप्सरा उतरी है,देखें जो आज उसका अन्त....
।।11।।
बालों मे गूँथे गजरा,मानो भुजंग सुगन्धित चन्दन पर लिपटा,
दीर्घा ग्रीवा दे रही सुन्दर दिखाई,मानो हो जैसें मद की सुराई..
स्फुट तन,नव यौवन भरा,क्षणभर मे ही हो स्फुटन क्रिया
उरोज-उत्तुंग उर स्थापित तन,कामाग्नि छूने को व्याकुल..
चले धरे कदम,मध्यम गति एक समान,
आघात पहुचे ना वसुधा को मेरी,चले मृग-सी चाल,
कटि बल्लरी समान,हर एक आलंब देने को इच्छुक....
।।12।।
देख-देख नृपति,आसक्त-अनुरक्त हो जाता है,
पाऊ इसे इसी क्षण मे,अब एक भी पल गँवाया जाए ना,
कुमारी की दिशा को साध,चलते-चलते पहुचे आश्रम....
।।13।।
बिताये दिन बहुत से,साथ कुमारी संग,
मन बसा कुमारी संग,मोहित मन अब कुमारी अंग..
विवाह रचाऊ,संगिनी बनाऊ,
बनाऊ तुम्हे अभिन्न अंग..
गुरु सेवा का अवसर मिला,मिला अप्सरा सुता साथ,
हो जीवन मेरा धन्य,हे ईश्वर स्वीकार करो,
इस अनुपम पल का प्रणाम....
।।14।।
खुशी आनन्द कब तक मंजूर,
है क्षण भर के आमोद-प्रमोद..
रचे लीला अनुपम-अदभुत,
ईश्वर को था कुछ और था मंजूर....
।।15।।
राजन की तलाश मे,दल-बल आया कुटी तट,
देख राजन सी छवि,पहचाने क्षणिक झट-पट..
राज धर्म याद दिलाया,प्रजा हाल सुनाया,
गृह विद्रोह का षड्यंत्र रचे कोई,बिना राजा कैसा राज्य कोई....
।।16।।
शापित जीवन के इस चरण,शायद कोई अब कोई विरह आना था,
राज-धर्म को प्रतिबध्द,राजा को अब जाना था,
मुद्रिका दी चिन्ह-निशानी,यह स्मृति जीवन के सर्वश्रेष्ठ पलों की....
।।17।।
कालान्तर का पहिया घुमा,कई बर्षो को पीछे छोड़ा,
विरह ने अपना शिकंजा छोड़ा..
सुध-बुध खोये प्रेमी स्मरण मे,विरह की बड़ी ही कठिन चाल,
चले अपनी मंद-मंद कच्छ्प चाल..
इससे बड़ा और संकट यही आनेवाला है,
मृत्यु लोक ही सबसे कष्टदायी,स्वर्ग ही सबकी अभिलाषा है....
।।18।।
भिक्षाम् देहि! भिक्षाम् देहि!
द्वार आपके खड़ा,मैं भिक्षुक,
एक मुष्टिका अन्न! बस इतने ही भोग का मेरा तन..
एक बाद एक पुकार लगाई,
भिक्षाम् देहि! भिक्षाम् देहि!
विरह की वेदना को सहती,कुमारी स्मरणीत थी प्रेमाव्याकुल....
।।19।।
हे! देवी,मेरा अपमान!
मैं महर्षि दुर्वासा,क्रोधाग्नि का मैं प्यासा,
अपमान मैं क्षणभर सह ना पाऊ,इसी क्षण शापित तुम्हे कर जाऊ....
।।20।।
स्मरण शक्ति झट से टूटी,
त्राहिमाम्! त्राहिमाम्!
हे! गुरुवर!
जीवन मे त्याग जन्म से मिला,जगत मे सर्वोतम मातृ-पिता मिले,
आरम्भ त्याग का उनसे मिला,त्याग सिवा जीवन मे कुछ ना मिला..
खुशियां मिली एक युग बाद,इनका रुख मोडो ना,
हे! महर्षि!
दुखों से रहा जीवन भर रिश्ता,यह रिश्ता फ़िर से जोड़ो ना....
।।21।।
श्राप का अपना असर,क्षण भर मे करे कार्य बसर,
हाय!जीवन मे लिखा तजना,पृथक रहूँ अब किससे..
रूदन करे शकुन्तला बार-बार,दोहराए तजना-त्याग एक समान,
पुर्व का सब जड़मति से मिटाया..
हाय!अतीत ने ठुकराया,
सृष्टिकर्ता करे विचार,देखो अतीत का व्यवहार....
।।22।।
देवी सोचे क्षण-क्षण यह,
एक मुद्रिका स्मृति देखो गँवाई वह..
गगरी भरने नदी तट पर,
मुद्रिका नदी जल मे ही समाई..
बिताएं जीवन के सर्वोतम पल जिनके साथ,
क्या है निर्भर मुद्रिका पर प्रेम मेरा..
प्रेम की कई आवश्यकता होगी?
मेरा प्रेम निश्छल-निस्वार्थ,
मैं पहुंचू राज-प्रसाद....
।।23।।
हे! राजन! हे! राजन!
मैं वनगामी शकुन्तला,
जीवन के अनुपम दिवस साथ गुजारे .
हाँ मैं वही शकुन्तला,
बुद्धि पर शाप का प्रहार,जड़ कुमति से राजन कहार..
हे! देवी! माफ करो,आरोपित करो ना व्यर्थ व्यंग प्रहार,
मैं राज-प्रासादो का वासी,मैं नही हूँ वनगामी,
हुआ तुम्हे कोई भ्रम,उपहास है यह नारी धर्म का....
।।24।।
शब्द से आहत हुई शकुन्तला,
हाय! प्रेमी भी छुटा,
हे! दया दान के दाता,जीवन नीरस है बिन स्वामी दाता..
क्या करू,कहां मैं जाऊ,बिन स्वामी जगत संसार मे कौन मेरा,
प्राण तजु अभी मैं मेरे,जब यही ठुकराए प्रेम मेरा....
।।25।।
निष्कासित भरी सभा से,घोर अपमान से पीडित,
शीश झुकाए चल पडी,उस कुटी उस वन की ओर..
महर्षि आश्रम का वास मिला,शायद जीवन पर्यन्त यही मिले,
जीवन के इस त्याग को भी स्वीकार,
गुजारुँगी जीवन समय की पुकार अनुसार....
।।26।।
दिया एक सुन्दर वत्स को जन्म,भरत-सा महान नाम मिला,
भरत खंडे साम्राज्य का नाम,चुना इन्ही के नाम..
सिंह-व्याघ्रो से बालक खेले,खोल मुख दिखा रदन तेरे,
आ तुझे मैं सवारी बनाऊ,मेरे मन का खौफ मिटाऊ....
।।27।।
जीवन का था यह सुखमय पल,जिसने भोगा सम्पुर्ण जीवन दुख,
मत्स्यजीवी को मीन मिली,काट तन मुद्रिका मिली..
सच्ची नियत,स्वाभिमान का वह धनी,जिसने दिखाया सत्य भाव,
दौड़ते-हाँफते प्रसाद तक पहुचा,दिखाई राजन को मुद्रिका....
।।28।।
दौडा-दौडा वन कुटी आश्रम पहुँचा,
हे! शकुन्तले! हे! शकुन्तले!
अब आया स्मरण मुझे,
मेरी-बुद्धि चेतना पर,महसूस किया मैने भार..
देखा आश्रम के बाहर,वीर बालक सिंह-व्याघ्रों पर करे प्रहार,
हे!वत्स!कहो कौन तुम?
कौन तुम्हारे मातृ-तात?
।।29।।
भरत नाम मेरा,माँ शकुन्तला का मैं प्यार,
यशस्वी राजन दुष्यंत मेरे तात..
सुनते ही राजन के लोचल मे बिजली सी कौंधी,
क्षण से बही अश्रुधारा,चक्षु रुपी झरनो से फुट पडी जलधारा,
तत्परता से गले लगाया,मेरा पुत्र भरत कहलाया....
।।30।।
देख राजन को नीर बहे,नैन पड़े लाल,
शकुन्तला सुनाए हाल,स्वामी आप बिन सब बेहाल..
अब मैं ना आने दु,कोई पीड़ा,वेदना,समीप तुम्हारे,
सुखमय बनाऊ पुरा जीवन,वत्स भरत संग हमारे..
चलो अपने राज-प्रसाद चलो,भोगे है तुमने कष्ट-विषाद,
भारतवर्ष का बनो तुम सम्राट,विश्वगुरु बने साम्राज्य तुम्हारा,
ऐसा हो साम्राज्य भरत का,हो महान स्वप्न् पुर्ण भरत के भारत का....
"इन्द्राज योगी"


