ऊंचे शिखरों पर जमा तुहिर,
बह रही होगी बन आंसू,
श्वेत धारा में कठोर जल,
भीगो रहा होगा मां का आंचल,
रची कोमल हथेली पर हथलेवा सी,
खोज रही होगी भाग्य रेखा सी....
संतृप्ता छाई होगी
मां की परछाई पर भी,
बाबा बैठे सुबक रहे होंगे,
छुपा-छुपा अपने आंसू,
बहना देख-देख कलाई,
शत्रु की गोली में ढूंढती बुराई,
हाथो में रेशम की डोरी,
छुपा रही होगी....
पर हाल क्या उस वीरांगना का,
रो-रो कर बिलख रही होगी,
बाहों में भर शरीर शहीद का,
रह-रह आंसू बहा रही होंगी,
मुख से न निकले शब्द कोई,
आवाज में चीख गुम गई होगी,
चहचाहट थी जिसके मुख पर,
अब गुम सी वह हो गई होगी....
चिट्ठी वो बैरी झूठी,
कुछ दिनों में आने का,
दे रही संदेश थी,
झूठी, झूठी, झूठी,
लिखी थी वे बाते सभी,
धूल हो गए वादे सभी,
किए थे जो संग जीने मरने के कभी....
एक रात स्याह बैरी,
जीवन में भर गई अपरिमित तिमिर,
एक समाचार का शोक-सा,
दुख देता सोच कर करे विचार....
संध्या का पहर ढल रहा,
आह! आज कैसा यह जमघट उमड़ रहा,
मां देखो आंगन में हमारे,
कैसा यह सन्नाटा पसर रहा....
आहट! कैसी यह?
मन उदास हुआ जा रहा,
कैसी शंका यह मन में?
मन संशय से भरा जा रहा,
रहा यह डर मन में सदा,
आई हूं जब बन संगनी उनकी....
सीमापार है तटस्थ, निडर,
काल बन घूमती होगी, गोली कोई,
पुत्र निडर, वीर सपूत,
चुनी राह मातृ भूमि की रक्षा को,
रक्त है उसकी बाजुओं में खोलता,
आवेश से तन वो जय हिंद बोलता....
भय कैसा यह तेरे मन में, बहु?
एक ज्वाला-सी हृदय में उसके,
लिपटे तिरंगों को देख फूटती थी,
आंखों में देशप्रेम की,
धारा सी फूटती थी.....
हांफते शरीर से दौड़ लगाता,
वह निर्बल हो गिर पड़ता था,
एक स्वर मन में गूंजता,
भारत माता की जय दोहराता था,
आया जब वक्त इम्तिहान का,
मन उत्साह से परिपूर्ण था,
जोश-उमंग के हिलोरे खाते,
एक सागर-सा उसमे उफनता था....
पहनी जब वर्दी सेना की,
फूले नहीं समाया था,
मातृ भूमि के समान,
शीश मेरे समक्ष झुकाया था....
हुई जब तैनाती सीमा पर,
एक गजब सुकून उसने वहां बतलाया था,
मां, मां, मां के उच्चारण से,
फूले नहीं समाया था.....
जब आया पहली बार घर,
छलके खुशियों के आंसू,
मां के हाथ रोटी खा कर,
किस्सा कहता वह हंस--हंस कर....
इससे अधिक अब और क्या कहूं,
जाता जब भी मातृभूमि की सेवा को,
आंसू वो और हम छुपाते थे,
कमजोरी से अपनी कमजोरी,
बस कुछ यूं कर के छुपाते थे....
आई जब तुम ब्याह के,
कुछ कमियां पूर्ण हुई,
चहल-कदमी से तुम्हारी,
हमारी खुशियां पूर्ण हुई....
आज तक जो ना हुआ,
पर कैसा यह संदेह है,
धरा तुम्हारे मन में,
सुना नही जो कभी मैने,
फूट रहे है शब्द जो क्यों आज ऐसे....
क्षमा! मां पर हृदय की वेदना,
दिखती हैं मेरी प्रति आपकी संवेदना,
जो रहा अटक अधरों पर मेरे,
विचलित कर रहा मन को मेरे...
बाबा कुछ आप ही बताओ?
यह कैसी गुत्थी उलझी मन में,
हां! अब आप ही सुलझाओ?
क्यों हृदय में पीड़ा है?
क्या दुखो ने उठाया बीड़ा है?
एक शोर-सा मच रहा,
धड़कनों में,
मन घिरा जा रहा,
अड़चनों में....
नींद बैरी भी आज आंख चुराएगी,
भला! हृदय पर भारी बोझ से नींद कैसे आएगी....
सुने वचन दुखदाई,आंखे तर से तैर आई,
आह! फूट पड़ा नैनो से झरना,
बेटी! दुखों ने अब चौखट पर हमारी दे दिया है धरना,
मातृ भूमि को रक्षा की खातिर,
बलिदान दिया है बलि वेदी पर हो,हाजिर,
वीर सपूत मेरे को,गह लिया है काल के अंधेरे ने....
लड़ा जो अदम्य शक्ति के साथ,
लिया शत्रुओं को आड़े हाथ,
थे संख्या में कुछ ज्यादा,
बैठे थे जो लगा घात....
मकसद कुछ उनका ऐसा,
लहूलुहान भारत को कर जाए,
असलों बारूदो की अग्नि से,
इनके चमन को उजाड़ जाए.....
पर थी यह सिर्फ गीदड़ भभकी,
मेरे सपूत की नजर क्षण भर भी न झपकी,
कुछ शत्रुओं को यह बात इस तरह अखरी,
एक टोली फिर मेरे बेटे की और दरकी....
हुआ सामना घनघोर,
शत्रुओं के मन में बैठा था चोर,
क्षण में गूंजा भागो,भागो शोर,
पीछे दुबके बैठे थे दुश्मन और,
किया पीछे से आघात,
किया उन्होंने युद्ध नियमो से प्रतिवाद,
हां! दुश्मन थे ही सभी अपवाद....
फिर भी बेटे ने मेरे चखाया उन्हें हार का स्वाद....
हाय! सुन यह हृदय विदारक शब्द,
मन क्षण भर में ही हुआ स्तब्ध,
आंखों में सूखापन-सा दौड़ा,
हृदय ने शीतलता का साथ छोड़ा....
विरह अग्नि हृदय को,
जंगल जीव-सा जला रही,
सुसौष्ट्व शरीर में सुन्नता आ पड़ी,
चीखू तो चीख नही,
कर्दन को आवाज नहीं,
रोऊं तो आसूं नही,
कहूं हृदय में भाव नहीं.....
किससे कहूं?
क्या कहूं?
क्या करू?
कैसे करू?
हाय! यह कैसी परिस्थिति?
अनजान मां ने देखा हाल,
स्वयं का भी हुआ बुरा हाल,
लाल लाल मेरे लाल,
कैसे हुआ तेरा यह हाल?
देख सेना की टोली,
रथ में आ रही बेटे की डोली,
आह! मोह बंधन अब सब टूटा,
दुख अब तेज चीख की आवाज में छूटा....
मरणासन्न सी हुई अवस्था,
अवचेतना की भंग हुई व्यवस्था,
बाबा का भी साहस टूटा,
आंखों से उनके भी दुख फूटा,
मां को ना अब भी विश्वास,
पत्र,लोग और ये रथ सब छल है झूठा....
लानत है ऐसे लोगो पर,
प्राणों की अफवाहें उड़ाते है मेरे लाल की,
वीर था,बहादुर था,
शत्रुओं का सामना करने को आतुर था,
कौन कह रहा फिर?
अब लाल मेरा नही रहा....
आंगन में आया बेटा,
लिपटे तिरंगे की पहन वेशभूषा,
दुख का पसरा सन्नाटा,
एक सुक्ष्म-सी ज्योति,
अवचेतन शरीर में फिर फूटी,
पाने को स्पर्श,
तिरंगे पर वह टूट पड़ी....
चेहरा वह देख रही,
झपकाए बिना पलके,
इस सूक्ष्म-सी दूरी पर,
वह आ सकी न चल के....
हृदय में कैसा भाव भरा,
प्रियतम पर तुम भी,
देखो कैसा है रूप धरा,
है बताओ यह कैसी लीला,
ये सब कहते है,
दुश्मन ने तुमको मुझसे छीना.....
कौन समझावे?
कौन समझावे?
सज्जन मेरे है निंद्रा सो रहे,
ओह! अब हो-हल्ला कैसा,
कैसा ये यहां शोर?
लोग ये कौन कहां के?
इतना जमघट क्यों यहां और है?
शयन निंद्रा में है,
सोने दो,
मेरे ख्यालों में खोए है,
खोने दो,
क्यों इतना तुम बवाल मचा रहे?
मेरे ही है,
मेरा होने तो दो.....
किंचित भीड़ में एक महिला,
ने गाल कुछ थपथपाएं,
हकलाती बोली से,
उसके भाव समाए.....
हुए पिया बलिदान को प्राप्त,
मातृभूमि के रक्षा के पथ पर,
विजय हासिल की,
नाम रोशन किया देश का....
गांव गौरान्वित हुआ सपूत से,
हे! वीरांगना तेरे सिंदूर से,
उठों कि अब समय हुआ,
पिया बिछड़न का.....
आह! एक दर्द फिर उपजा,
मस्तिष्क में फिर यादों का संचार हुआ,
हृदय चेतना से भर गया,
शरीर पर शब्दों का कैसा प्रहार हुआ....
ले जाने को आतुर हो तुम,
कौन पर मुझे इनसे पृथक करे,
शरीर गया,शरीर गया,
मन से कौन पृथक करे.....
मैं परछाई हूं इनकी,
घूमती हूं साथ-साथ,
कैसे करोगे अब विच्छिन्न,
मैं न आऊं तुम्हारे हाथ....
पिया ने किया प्राण न्योछावर,
मातृभूमि की रक्षा को,
कर गए मुझे गौरांवित,
अगले कई जन्मों तक....
देशप्रेम का उत्साह था,
मन में मातृभूमि थी बसी,
पर एक सुक्ष्म से भाग,
मैं हसी खुशी बसती थी....
दिया मान-सम्मान एक आयु तक,
रखा सह-सम्मान जीवित आयु तक,
मेरा अब प्रणाम लो,
करों स्वीकार अंतिम बार लो....
हे वीर सपूत धन्य हूं,
जनी जन तुझ को,
मैं भी गर्व से भरी,
शहीद की मां,
अब नाम धरी.....
बेटा मैं बाबा तेरा,
किया प्रेम तूझसे अपार,
अप्रत्यक्ष ही सही,
लगाया अब तूने ही बेड़ा पार.....
उठ चला अब कंधों पर,
जय हिंद के नारों से,
जब तक सूरज,
चांद रहेगा,
अमर शहीद तेरा नाम रहेगा,
नामो तक......
हाय! मातमी धुन यह कैसी,
हृदय में फिर दुख भर रही,
आंखों से निकले जलधारा,
हृदय की वेदना धुन में निकल रही.....
संभालों अब वीरांगना,
यह तिरंगा दामन में,
लगाओ शीश स्पर्श कर,
करो अब सम्मान शीश झुका कर.....
आज दिन यह विशेष,
यह ही निशानी मेरे प्रेम की,
निशानी यह विशेष मेरे पिया की,
हुई जा रही छाती मेरी गौरान्वित,
भर कर यह भाव विशेष....
मातृभूमि की रक्षा सैनिक के,
जीवन का सार है,
हो जाते वीर कई न्योछावर,
यही वीरता का हार है
जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद
"इन्द्राज योगी"


