1.

(कैकेयी एवं दशरथ संवाद खण्ड)


।।1।।

भास्कर किरण कल की,लाएं शुभ एक समाचार,

आज रैन कटे कैसे,गहन हो रहा आचार-विचार,

अवध को मिले राजन नव,

हमारे राम का हो राज तिलक-श्रृंगार....


।।2।।

जीवन में उत्पन्न कई अच्छाईयाँ,पर पनपती कई बुराईयाँ, प्रगति-पथ पर बाधित करें,रोके स्पर्श करने को ऊंचाईयाँ,

मन ही मन विचलित-सी,चारों ओर विचरित-सी,

पुत्र मोह में सोच राज-पाठ,कैकयी को बात अखरती है,

मिले पुत्र भरत को शासन,यही विनती मेरी है....


।।3।।

कुंठित मन की पड़ी छाया,राजन की पड़ती अंतर्दृष्टि है,

राज-पाठ का प्रश्न कर,मन में वितरंगो-सा आवेश उठा,

राजन ने उठा दृष्टि,देखा सम्पूर्ण परिवार शीश उठा,

महलों में क्रीड़ा-आनंद लिए,चारों कुमार समान,

मातृ-प्रेम मिला इन्हें,मिला बटाँ ना असमान....


।।4।।

एकता-अखण्डता पर स्थित, सम्पूर्ण महान राज्य अवध,

आज इन प्रश्नों के बाणों से,किया अवध का तुमने वध,

किसी सूक्ष्म,चिंगारी ने भड़काया है आज तुम्हें,

होगा इसके परिणाम भुगतना हमें, भुगतना तुम्हें....


।।5।।

कोई भेदभाव यहाँ ना हो पाया,

सम्पूर्ण जीवन नहीं किया यह पाप,

तीनों रानी-चारों कुमार,सम्मान-समान एक समान,

आज तुम्हारे मन में जागी,कुलक्षित भावना है,

कुंठित मन का वीभत्स रूप डरावना है....


।।6।।

मैं दशरथ चक्रवर्ती,महान राज्यों को मैंने जीता है,

आज तुम्हारे ठेस व्यंग्यों से,खुद को मैंने हारा है,

खेलते थे जब कुमार,महल के आंगन-आँचल में,

खिलखिला उठता था,सम्पूर्ण अवध क्षण-क्षण में....


।।7।।

कुमार ना झगड़े आपस में,सदा ही रहा बंधुत्व भाव,

हंसी-ठिठोली में रहे सदा,एक के बिना एक का अभाव,

राम-सा पुरुषोत्तम,लक्ष्मण-सा आज्ञाकारी,

भरत-सा भातृत्व प्रेम,शत्रुघ्न-सा परोपकारी,

अन्यत्र संसार में इनसा कोई मिल पाना,

सर्वश्रेष्ठ उदाहरण,यह भारतवर्ष भारतखंडे....


।।8।।

हे! देवी,मन का भ्रम मिटाओ,

बनो तुम वही माता,राम-भरत एक समान,

मिले राम को अवध राज,

यही है अवध की पहचान....


।।9।।

भरत नहीं है यहाँ,

होते तो भी इनकार था,

राम ही होते उनकी सलाह,

ऐसा भातृत्व का प्यार था,

विलाप करेंगे,क्रंदन करेंगे,

वक्षस्थल पर प्रहार करेंगे बारम्बार,

राम-वियोग को सह ना पाएंगे,

मचाएंगे रुदन की मार्मिक चित्कार....


।।10।।

मिले राम को वन का वास,

यही हो परीक्षा अग्नि-समान,

चौदह बरस का हो वनवास,

आज्ञाकारी है,आज्ञाकारी,

है,देखते तात् की आज्ञा का सम्मान....


।।11।।

मैं तात् नहीं दे सकता आज्ञा,

दुर्गम वन में जाने की,

पथ में मिलेंगे शूल-कंटक,

भयानक भक्षी-नरभक्षी समान,

मर्यादा पुरुषोत्तम मेरे राम,

है सर्वश्रेष्ठ गुणों के धाम,

कोई ना उचित विकल्प अन्य राम,

मुझसे ना होगा यह अनुचित काम....


2.

(राम की पितृ आज्ञा खण्ड)


।।1।।

मौन खड़े हुए,समीप राजन के राम,

मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे,अव्याकुल राम,

पितृ-आज्ञा महान,झट से बोले खोल पंखुड़ी समान ओष्ठ, मैं निभाऊ बिना सोचे,विचार-विमर्श पुत्र गुण औछे,

हाँ! भरत भी मेरे समान,है मेरे अनुज भ्राता....


।।2।।

अनन्य है,प्रेम भरत से,

अभाव में,भरत के हृदय भर आता,

है हर्ष राज-पाठ,मुझे मिलने से ज्यादा,

भरत हो,चक्रवर्ती अवध का राजा....

।।3।।

मैं मानूं हर आज्ञा,अपने तात् श्री की,

मैंने निभाऊ हर वचन पालना,अपने तात् श्री की,

हाँ! मुझे मिलेंगे पथ में शूल-कंटक,भयानक-भक्षी-नरभक्षी,

लेकिन मैंने इन्हें भी झेला,वशिष्ट मुनि के वन से धकेला....


।।4।।

नर-भक्षी,दैत्य-दानव,यह तो मेरे आगे नतमस्तक,

मेरे तीक्ष्ण बाणों के आगे,विच्छेद है उनके मस्तक,

है चिंतन,मुझे हिंसक व्याघ्र-सिंहो का,

मै ना भेदु,उनके सुंदर कोमल शरीर को,

है उनका निवास,अधिग्रहण मेरा ही होगा वहां,

ऐसे में उचित है,प्रहार उनका....


।।5।।

प्रेम-दृष्टि पड़े जब,मन विरक्ति से भर जाता है,

कहां हिंसा रह पाती है,तत्व भी अनुरोध से भर जाता है,

मैंने पाई विद्या,महान गुरु-ऋषियों से,

हर क्षण हर पल मैं कूच करूं,शिक्षा पाई ऐसी मैंने....


।।6।।

हे! तात्। आपको निश्चित ही ज्ञात होगा,

ताड़का-सी,रौद्र-रूपी,

वह विकराल-रूपी,राक्षसी-सी,

सब भय से कपकपाए,

दौड़ रहे चारों दिशाओं में,

एक मैं स्तर खड़ा देख रहा था,

अविचलित मन से,

भुजाएं मेरी उछाह से फड़फाड़ई,

मन में साहस का आवेश भरा,

नैन क्रोध से लाल पड़े,

मन में कई ईप्सा जगी,

अभी मृत समान धरातल पर इसे गिराऊ....


।।7।।

हे! तात्। आप निश्चिंत रहो,

मैं अब ना रहा किशोर चंचल,

मैं युवा आत्मविश्वासी,स्वाभिमानी के तेज से भरा,

जंगल में विपदा आए,

हैं जंगल जीवन ही दयनीय,

करना पड़े क्षण-क्षण संघर्ष,

है जीवन जंगल का आधार यही....


।।8।।

जंगल-सी समानता,

यहाँ-कहाँ विकसित हो पाती है,

भेदभाव से सब देखें,

अनाधिकृत धौंस जमाते हैं,

है जंगल संसार कोमल-सुंदर

रंग-बिरंगे जीव-जंतुओं का,

सुरमय झरने,गाती नदियां,

है विचित्र चित्रण प्रकृति का,

जंगल की ही है विशेषता,

हिंसक प्रवृति स्वभाव प्रहार....


3.

(प्रजा-राम वियोग)


।।1।।

हे! तात् । भास्कर की प्रथम किरण से पूर्व,

मैं वन गमन को प्रस्थान कर जाऊं,

दो आज्ञा मुझे इस जन्म,

पितृ आज्ञा से जन्म को कर जाऊँ अपूर्व....


।।2।।

राज-मोह,कुमार भेष त्याग,

राम ने तपस्वी वेश धारण किया,

शीश पर बांध केश जटाएं,

हाथ धनुष-बाण तुणीर लिया,

पुत्र वियोग के दुख से राजन,मन व्याकुल है,

नैनों से नीर बहे,गालों पर आंसुओं के धारे चले,

पितृ-आज्ञा से कर स्वयं को वचनबद्ध,

वन गमन को राम चले....


।।3।।

प्रजा में शोक की लहर,

सबके चहेते हमारे राम,

राम नाम की गूंज से गुंजायमान,

हर दिशा से सुने राम-राम,

अवध की यह दशा,

हाय! मन को कचोटती है,

प्रजा के नैनो से आंसू हमें दुत्कारते है....


।।4।।

यह दुख यह विलाप,अब ना सह पाऊंगा,

इसी क्षण,निश्चित ही प्राण तज जाऊंगा,

मैं राजन,इस अवध नगरी का,

पर प्रेम अनुरक्ति में,यह तुम्हारे डूबे,

हैं इनको मुझसे,पहले जरूरत तुम्हारी,

तुम बिन ये अधुरे....


।।5।।

हो प्रकाशमान,पुंजवान,

तुम इस नगर के दीपक,

मत जाओ वन में तम-अंधकार में छोड़,

प्रजा का यह लगाव-प्रेम,

विरह-वेदना प्रताड़ित होगी मेरे द्वारा,

छोड़ तुम जा रहे हो इनको,

ये शापित होंगे मेरे द्वारा....


।।6।।

मध्य रात्रि को पाकर संदेश,

यह सब कुछ छोड़ आए हैं,

एक छवि देखें,हमारे राम की,

यह सोच दौड़े-दौड़े आए हैं,

नगर में फैला है अँधियारा,

देखो चारों ओर,

अवध का ही भानु डूबने चला है,

प्रकाश भला भाये किस ओर,

हम ना जी पाएंगे,

बिना छवि देखे बिना,

सूर्य चंद्रमा को बाद देखें,

श्री राम छवि सर्वोपरि....


।।7।।

हे! वसुधा है,हमारी विनती,

इस दृश्य से पहले,हमें निगल ले,

हे! सरयू-सरिता जल-प्लावन में हमें डुबो दे,

हे! दिनकर ना उदय हो,

विचरित रहे सुधाकर ही केवल,

तेरी प्रथम किरण हमें शापित कर देगी....


।।8।।

राम हमारे वन को चले,

मध्यम भाग भार्या जानकी,

पार्श्व भाग लखन भ्राता,

चौदह बरस वनवास को,

क्षणभर में दृष्टि ओझल होते राम....

"इन्द्राज योगी"