सत्रह बार की माफ़ी पर,
एक बार की गद्दारी भारी थी...
घर का भेदी जयचंद था,
पर कवि चन्द्र अपना था...
पृथ्वी धर्मपरायणता,कर्तव्यनष्ठता,दान,दया का दाता था,
ऐसे सर्वश्रेष्ठ कर्मो से दिल्ली का विधाता था...
अश्व नित्य रम्भा की कर सवारी रण क्षेत्र में,
मां वसुधा को रक्तरंजित कर जाता था..
वो पृथ्वी ही था जो अनदेखा प्रमाण बतलाता था,
अर्जुन सा था धनुर्धारी,
शत्रु सेना में चित्कार मचाता था..
छल,छद्म की इस योजना में अपने नैन गवाएं थे,
इन्हीं नैनो ने तो संयोगिता के ख़्वाब संजोए थे...
बादल सी उस अश्व की गति,
प्रेयसी पृथ्वी को ले उड़ा था...
सुल्तान को बस ठनी थी,
संयोगिता क्यु पृथ्वी की बनी थी..
सुल्तान की कपटी चाल से पृथ्वी छला जाता है,
प्रेयसी अंग विहीन घुटनों के बल गिर जाता है...
परम सखा चन्द्र अपना मित्र धर्म निभाता है,
दृष्टिहीन पृथ्वी को उचित प्रमाण बतलाता है...
उपर सिंहासन पर बैठा,
सुल्तान दंभ ठहाकों से उपहास उड़ाता है...
शांत सभा में प्रमाण नाप,
पृथ्वी बाण चड़ाता है...
एक बाण मात्र से ही,
शत्रु शीश उड़ाता है...!
:- इंद्राज योगी
