दरबार अलंकृत जनक का,आगमन महान राजाओं का,
वैदेही स्वयंवर का वाद सुनो,लक्ष्मण-परशुराम संवाद सुनो,
जनकपुरी में भारी उत्सव,वैदेही स्वयंवर है रचा,
भारतबर्ष में उत्कंठा,है देखो कैसा कोलाहल मचा....
जानकी परिणय संग उसके,शिव-धनुष भंजन करे,
विपदा उसके बाद यह,परशुराम क्रोध का संताप सहे,
है विराजे महान नृप,आगमन देख जनकपुरी दंग,
अभिमान से शीश उठाए,ले जाए वैदेही संग....
जनक पितृ भाव से,सम्मान करे अथक उछाह से,
फैला अधरों पर मुस्कान,अभिवादन करे उमंग से,
पर्दापण हुआ जब अहंकारी का,एक देवारि लंकेश सा,
जोर-जोर से अट्टहास लगाए,दंभी-अभिमानी सा....
हे जनक! अनादर किया,स्वयंवर आमंत्रण न दिया,
मैं वीर अद्वितीय पराकर्मी,भग्न कर धनुष ले जाऊं सिया,
विलोचन विमुक्त अधर्मी से,जनक आसन पर बैठाए,
कर ध्यान शिव का विनती हृदय से,दुष्ट यह ना धनुष उठाए....
कौतुहल का क्षण देखो,विश्वामित्र संग दो तपस्वी देखो,
स्वयंवर में फैली अद्भुत छटा देखो,नैनो में तेज,अक्षरों पर मंद-मंद मुस्कान देखो,
हे राजन!हम तपस्वी,इस स्वयंवर में आए है,
देख तैयारी उत्सव की,जनक नगरी नैनो को भाए है....
वैदेही एक नार,सत्य पवित्रता की मूरत,
परिणय आयोजन आयोजित,दृष्टांत दैवीय सूरत,
हुई प्रतिक्षा की प्रत्याशा पूर्ण,अभिमानी शीश सब झुके,
दंभ ठोकते दंभी कई, दम भर कटि झुके....
ना उठा पाया अधर्मी कोई,राजा हो या चक्रवर्ती कोई,
प्रत्यांचना चढ़ा छोड़,उठा ना पाया धनुष लंकेश सहित कोई,
तपस्वियों ने होंठों पर हंसी फैलाई,ले आज्ञा मुनिवर की धनुष तरफ कदम ताल बढ़ाई....
शीश झुका शिव का ध्यान धरा,कर मिला वंदन शिव धनुष,
विदित मन स्थिति में,धनु शिवधर अलौकिक,
ज्ञात यह भी शिवांश स्वयं,जीवन पर यहां भौतिक,
निर्जन सा ज्ञात पड़ता,दृष्टि डाली पुरातन सी,
पुरा युग से सहेजा है,जरूरी भंजन लोक कल्याण को,
उठा कदम हस्त बढ़ाया,धनुष थाम उपर उठाया,
अंगुल से खींची प्रत्यांचना,झट से शिव धनुष तोड़ गिराया....
एक शोर चारों ओर गूंजा,श्याम घटाओ ने जाल बिछाया,
अम्बर ताड़ित से गरजा,धरा को थर थर थर्राया,
ज्ञात हुआ राज जनक को, जवाबदेह मैं परशुराम ऋषि का,
बिना आज्ञा खंडित हुआ,भय परशुराम ऋषि का....
क्षण में संदेश प्राप्त हुआ,पहुंचे रक्त लाल लोचन से,
जनक दरबार में पैर रखें,दानव संहार भुजाएं से,
दृष्टि पड़ी भंजन धनुष पर,वज्रपात टूटा जनक पर,
त्राहि माम त्राहि माम,उत्तरदायी यह लोक भावना सी,
प्रथम बार सुखद अहसास,भंजन में संश्लिष्ट हुआ....
रे तपस्वी!तुम्हारा दुश्साहस,स्पर्श धनुष को करने का,
उठा कर बाहु बल से,आध भाग में करने का,
पर क्या विदित हुआ नही तुम्हे,है धनुष किस पराकर्मी का,
मारे दानव दुष्ट कई,किया संहार कई पिशाचों का....
मैं रौद्र,नही मुझसे बलशाली कोई,
थर्राए नभ-व्योम,डगमगाए भू-धरा,
मारे जाओगे तुम भी,है दुष्कृत्य तुम्हारा,
शिव-धनुष शिव-निशानी,थी जनक को जिम्मेदारी यह निभानी....
एकाएक अनुज तपस्वी में क्षत्रिय गुण जागा,महसूस किया उपहास सा,
देखा क्रोधित मुनिवर को,कटु शब्द से स्वयं को अपमानित सा,
स्वयंवर की प्रतिज्ञा यह,धनुष भंजन परिणय बंधे,
कर हमारा तिरस्कार,क्यों धनुष-धनुष पर हो अड़े.....
तोड़े तो है कई,बचपन,यौवन,समर में कई,
मारे भगाए संहार किए,दानव-दनल कई,
पड़ी दृष्टि स्वामी की,हुआ प्रतीत व्यर्थ सा,
तोड़ दिया क्षण भर में,भ्रम जो फैला बीच सभा....
क्रोध की सीमा फिर बढ़ी,लपटे उच्च बढ़ी ज्वाला सी,
जली हृदय भीतर कुछ,प्रतीत जली नेत्रों में अति,
लाल नेत्रों रक्त टपके, बाजुओं में बल उमड़े,
मूर्ख तपस्वी अपमान है,शिव आज्ञा मुनिवर का....
शस्त्र उठाए है इन हाथों,पढ़े पढ़ाए शास्त्र कई,
अमर अजर सा मैं योद्धा,अवगत भीष्म योद्धा सदा,
क्रोध,अग्नि मेरे दास,बचने को करे सब मुझसे अरदास,
क्या ज्ञात नही है तुमको,या भ्रम तुमको खुद पर कोई विशिष्ट....
वाद विवाद टूक सुन,मुस्करा रहे रामजी,
ज्ञात हुआ रूप एक,समान मेरे हरि,
बात अनुज की का प्रतिकार कर,हाथ जोड़ अभिवादन किया,
मैं राम नरेश दशरथ सुत,अवध अधिवास लिया....
तपस्वी तुमने तोड़ा धनुष, संभव नहीं मानुष ज्ञात,
दिव्य दृष्टि अलौकिक,क्षण भर में परिचय हुआ ज्ञात,
ज्वार सा शांत हुआ क्रोध,रूप जो धरा रौद्र,
हस मुख पर मुस्कान फैलाई,हरि हरि हर हर हर्षाए....
मुनिवर मैं रघुवंशी,वचन बद्ध मैं संस्कारों का,
दे कौन ललकार,दे जो काल गाल समाय,
संभव ना था हर कोई से,प्रत्यक्षदर्शी हम भी थे,
वैदेही परिणय जुड़ा,किंचित भंजन हमसे हुआ....
क्षमा अनुज भ्राता को मेरे,सहसा पहचान यह नही पाएं,
स्वाभिमान को ठेस पहुंची,यह हो आग बबूला सह नहीं पाएं,
मुस्कराहट से कर आगे बढ़ाए,भगवान ने दिया आशीष,
लखन,राम संग सिया,शीश झुका आशीष लिया....
"इन्द्राज योगी"


