पांचाल देश की मैं राजकुमारी,
द्रुपद राजन् की मैं राजदुलारी,
पंच कन्याओं में सबसे न्यारी,
सब कहते हैं मुझको चीर कुमारी....
यज्ञ कुण्ड से जन्मी,
मै यज्ञसेनी कहलाई हूं,
द्रुपद की बेटी मैं,
द्रोपदी कहलाई हूं....
थी कामना सर्वश्रेष्ठ पति की,
शिव का ध्यान लगाई हूं,
मिले सर्वश्रेष्ठ सर्वगुण पति,
यह आश जगाई हूं.....
हो संगम कैसे,
कैसा रचा विधान होगा,
मिले मुझे प्राणनाथ तभी,
जीवन मेरा साकार होगा....
थी कोई रंजिश,
ह्रदय विदारक खटक रही,
कहे थे बोल किसी ने कड़वे,
बदले की आग भभक रही....
द्रोणाचार्य मैं,गुरु सर्वश्रेष्ठ,
गुरु दक्षिणा,है कर्तव्य तुम्हारा,
हो महान द्रुपद का राज्य,
शीश झुका द्रुपद का हारा....
सुंदर लंबे केश,नेत्र कमल समान,
भोंहे अर्धचंद्र सी,वर्ण श्यामल,
जन्म है,अद्भुत इसका है....
कोई नहीं,है भविष्य की चाल,
अब होगा विवाह,रोमांच भरा....
इम्तिहान होगा सभी का,
भाव विवाह संबंधी हृदय में जिसके,
बताते हैं जो श्रेयकर स्वयं को,
परखेंगे आज परिमाण उनका....
सफल होगा वही ध्यान जिसका,एकाग्रचित,
सफलता होगी सिर्फ उसी की,
लक्ष्य जिसका अटल सदा....
ले जाए संग द्रौपदी वह,
सामने जो प्रतीत है लक्ष्य,
लक्ष्य वह अभेद है,
मीन विचरित चारों दिशा,
जल प्रतिबिंब से भेद है,
ले जाए संग द्रोपती वह....
था वहां मौजूद अर्जुन महान तीरंदाज,
भेद दिया नि:संकोच,
संग ले चले द्रोपती को वह,
मात् ! देखो हम क्या लाए,
साथ हमारे देखो क्या लाए,
पुत्र सभी की खुशी देख,
माता ने आदेश दिया,
लाए हो जब कुछ भी,
आपस में ही मिल बांटे हो,
ज्ञात ना था माता को कुछ,
लाए पुत्र विशेष आज....
मात्! आज्ञा अटल है,
वचन दिया जीवन पर्यन्त तक निभाएंगे,
लगाया जब अंतर्ध्यान,
ज्ञात हुआ तब वह वरदान,
पंच-पंच कह कर मांगा वर,
पति सर्वश्रेष्ठ पंच गुणों सा मैंने....
पहुंचे जब गृह राज्य,
बिगड़ी नियत पापियों की,
पाए कैसे करना होगा,
कुछ अनर्थ अथक-सा....
राजनीति के दांव-पेच में,
बलि नारी की चढ़ती आई,
जुए की लत ने देखो,
आज नारी दांव पर लगाई....
कहा था तुम सभी ने रखेंगे मान सदा,
जीवन रक्षा होगी तब तक,
प्राण अवस्थित देह में रहेंगे जब तक....
फिर आज किसकी आज्ञा से,
तुमने लगाया दांव मुझ पर,
हूं,नारी मैं भी,
बोध कराया आज वस्तु जैसा....
धर्मराज! तुम धर्म के प्रहरी,
फिर क्यों अधर्म को अपनाया,
अनिष्ट-सी इस सभा में,
तुम्हारा धर्म भी धुंधलाया....
केश खींचे हैं इस पापी ने,
किया निर्वस्त्र मुझको इस भरी सभा में,
हो जीवित अभी तुम,
प्राण बचे हैं क्या तुम्हारे देह में....
महान धनुर्धारी-सा अर्जुन,
टूटा पड़ा प्रत्यंचना-सा,
महाबली भीम प्रतीत हो रहा,
पड़ा हुआ निर्बल-कमजोर सा....
रुके कदम है महान अश्वारोही के,
तलवार लज्जित करती,
अब देखो इनकी मुट्ठी में....
पितामह भीष्म!
क्या तुमने अमरत्व पाया,
यह दिन-विशेष देखने को,
राजद्रोह से ज्ञात हो,
क्या-कैसे है नियम,
किसने की पालना इनकी....
अरे! होती होगी कोई सीमा,
लज्जित करने की किसी को,
किया जो तुमने मुझको इतना....
मैं स्त्री आदिशक्ति है वचन,
नाश करू कुल सहित,
बांधु मैं अपने केश तभी....
पाप की सीमा लांघ गए,
धर्म को रौंदकर,
होगा नाश निश्चित है,
यही नियम तोड़कर....
सब यह षड्यंत्र कारी है,
सबकी नियत अपराधी-सी
निश्चित ही ध्वस्त होगा,
है सर्वत्र दृष्टि अहंकारी-सी
"इन्द्राज योगी"


