समाज ने हर पथ पर ठुकराया,
अपमानित ही रहा सदा मेरा मान,
उपभोग मात्र ही समझा मुझको,
रौंदे रखा सदा मेरा सम्मान....
बंद प्राचीरो बीच क़ैद रखा,
जकड़े रखा लौह-बंधनों में,
कुप्रथाओ और अंधविश्वासों,
का सम्बन्ध बनाया मुझसे अटूट....
जग जननी स्वरूप मैं,
जननी जन्म भूमि मैं,
हर बंधन पवित्र मेरा,
सुख से परिपूर्ण पावन शीतल मै....
सहन शक्ति की देवी मैं,
सदियों से सहती आई हूं,
पथ-पथ पर किया अपमानित मुझे,
सदियों से अब तक होती आई हूं....
अनेक-सी कुप्रथा चला,
शोषित किया मुझे हर पथ पर,
समाज ने हर समय मुझ पर,
किए कई प्रबल प्रहार....
हंसती खुश दिखी,
चरित्रहीन का दिया लांछन,
कभी जो मायूस दिखी,
कुंठा का दिया कलंक....
कब तक सहती रहूंगी मैं,
ये अपमान दुराचार,
आत्मा भी मुझे दुत्कारती है,
देखती है जब यह भेदभाव....
मैं तो ऐसी नहीं थी,
मैं सर्वविदित पूज्य थी,
ब्रह्मा विष्णु महेश सदैव,
मेरी तपस्या में सदा ध्यान मग्न रहते....
मैं महाशक्ति गोरी,
नवदुर्गा रूप विराजित,
सर्वोपरि है श्रेय जिसका,
वह मैं अधिष्ठात्री देवी....
जहां जन्म लिया,जन्म भूमि,
जहां रहे राष्ट्र भूमि,
भूमि-भूमि मां वसुंधरा,
अंततः कल्पना मां जननी....
पुराण-उपनिषदों में वर्णित है,
मेरा सम्मान-स्वाभिमान,
सर्व कार्य सिद्ध होते,
जाता सर्वप्रथम मुझको श्रेय....
किसने यह विचारधारा बदली,
इस पूजनीय सम्मान को मिटाने की,
अनेक कुप्रथाओं में बांध दिया,
खाई किसने कसम नारी के,
स्वाभिमान को मिटाने की....
कोई विजित रहा या पराजित,
नारी सदैव सुरक्षित थी,
फिर कौन है यहां आया ऐसा,
बदनीयत,काले मन जैसा....
जिसने विजित धन के समान इन्हें लूटा,
इज्जत मान-सम्मान वचन दे झूठा,
कोरे रूप मात्र की कर कल्पना,
उस कुमानुष में हवस का संचार फूटा....
स्वाभिमान का स्तर ऊंचा,
स्त्री मन में नभ से ऊंचा,
किया कभी ना समझौता,
सदैव शत्रु रक्त से स्वयं को सींचा....
हर पल हर क्षण,
भेदभाव सदा ही रहा,
निर्बल कमजोर समझ,
अत्याचार होता ही रहा....
कभी अशुद्ध का दिया ताना,
कभी डायन का पहनाया बाना,
कुल्टा-कुंठा कहे जमाना,
पड़ा क्या से क्या चुकाना....
जहां सहा है नारी ने जीवित,
अग्नि की जलन को,
ऐसी सहनशक्ति होगी कहां,
कहां है क्षमता अन्य में सहन की....
किसने यह व्यवस्था बनाई,
यहां अग्नि परीक्षा की,
सती है,सत्य ही है वह,
क्यों कुप्रथा पर वह बलि चड़ाई....
सदैव प्राण रहे दांव पर जिसके,
क्यों अंततः हरे जाते,
परिवार,समाज सब जगह,
क्यों हर जगह हरे जाते....
स्वयं जननी है जो,
मिला जगत समाज जिससे,
आज स्वयं आरोपित है,
समाज वही नेत्र मूंद संकेतिक करे इसे....
शिक्षा से दूर रख,
बुद्धि पर किया प्रबल-प्रहार,
पर हुई कई विदुषी यहां,
दी चुनौती समाज को यहां....
सुरक्षित मैं ना थी रामायण काल में,
ना सुरक्षित महाभारत काल में,
हर जगह लगा दांव पर मेरा सम्मान,
जमाया हर एक ने आधिपत्य मुझ पर....
कोई रावण,कोई दु:शासन,
यहां सदा ही होता आया,
नारी के स्वाभिमान से,
यहां खेलता हर कोई आया....
अब इन सब से मुक्त इन्हें कर दो ना,
क्यों अब इन बंधनों को तोड़ो ना,
अब उड़ने दो विस्तृत है आसमान,
हां इन पिजरों को तोड़ो ना....
ये क्षत्राणी है,पराक्रमी खूंखार
अब इन्हें पराक्रम दिखलाने दो ना,
अब दे दो इन हाथों में ढाल-तलवार,
इन में नव संचार की स्फूर्ति भर दो ना....
दे दो ना इनके हस्त कलम-लेखनी,
ये भी उकेरेंगी अपने शब्द,
कुछ कोरे पन्नों पर,
कुछ आकृतियां उभारेगी,
आधुनिक समाज की झलकियों की....
"इन्द्राज योगी"


