मिली थी कल जिंदगी मुझसे,
फटे मैले-कुचैले से चिथड़ों में,
हाथ आगे बढ़ा मायूसी से,
खुशियां मांग रही थी चंद सिक्कों में.....
मैं भी मृदुल ह्रदयी था,
क्षण भर में ही पिघल गया,
पड़ी नजर मायूस चेहरे पर,
झट से हाथ जेब में फिसल गया...
पड़े थे कुछ सहेजे हुए,
सिक्के दो-चार,
बटुए के अंदरूनी भाग में,
मेरी फोटो के पीछे साथ में....
अहा! जिंदगी मुस्काई,
देख के हथेलियों में सिक्के,
दिल को मेरे भी सुकून मिला,
थमा उसकी हथेली में खुशियों के सिक्के....
फिर भी नजर हटी नही,
टक टकी लगा मैं घूरता रहा,
बचपन के इस निवेश को,
बैठा-बैठा मैं समझता रहा....
देखा फिर मैं अचंभित हो,
बचपन की भूख पर,
खेल की ललक भारी थी,
ठीक वैसी ही जैसी हमारी थी....
ओ!दुकान वाले भैया,
ये मोटी गेंद चाही,
खोल हथेलियां दिखाया,
खुशियों का पिटारा....
हाथो में थाम मोटी गेंद,
अहा! एक खुशी फिर दौड़ी,
आह!जिंदगी अब नन्हे पैरों से दौड़ी....
खेल फिर पैरों से,
मार-मार रहा ठोकर,
प्रतीत हो रहा मानो,
खुशी में मग्न होकर,
दुखों को मार रहा ठोकर....
यह दृश्य अब आंखों में मेरे समाया,
हृदय ने फिर लिखने का भाव जगाया,
जमी अंगुलियाँ फिर लेखनी और कागज पर,
बना कागज नन्ही जिंदगी का मैदान,
लेखनी से मार ठोकर किया उस वृतांत का व्याख्यान....
"इन्द्राज योगी"


