खुद-ब-खुद देखेंगी, इक दिन मेरी राह वो,

खफा! आखिर कब तक रहेंगी वो,

गिदार्ब मेरी यादों का घेरेगा उसे हर शाम,

मारे गिरियां पुकारेगी मेरा नाम,

उसकी नाराजगी ही उसका ताराज़ है,

तरकीब एक सोची थी मैंने,

गर! दर मेरे आओ तो दास्तां सुनाऊं,

दर्द कितने है दिल में मेरे,

आओ तो तुम्हे सुनाऊं,

नाआश्राओ का बेदखल आना,

छोड़ दामन तुम्हारा जाना,

नाओनोश रहे रात-दिन हम तो,

नाउम्मीद तेरी राहों में बैठे.....

~इन्द्राज योगी