कोई कानून ऐसा बन जाए,
जिससे मेरे आंगन में,
चहकती गुड़िया सुरक्षित हो जाए....
समाज में सर्वत्र फैले हैवान,
रक्त से सनी उनकी जुबान,
कोई तो मदद सियासत कर जाए,
जहन में आए जब भी यह कुविचार,
सोच कर ही हैवानियत मर जाए....
यह कुविचार उसने,
अपने मस्तिष्क पटल पर लाया होगा,
हैवानियत को दे निमंत्रण,
अपनी मानवता को मारा होगा....
फूल सी नाजुक मेरी गुड़िया को,
जब इन हैवानों ने रौंदा होगा,
निशाचर तो ना थे,
उससे भी बढ़कर यह कुप्रवृत्ति का दुष्कृत्य होगा....
दुष्कृत्य की कर कल्पना,
अपना विवेक खोया है,
दूध मुँही तक को ना छोड़ा,
ऐसा दरिंदा रूप है बोया....
अपनी सोच के साथ,
उन्होंने कर्मों का स्तर भी गिराया है,
कर शरीर पर प्रहार दरिंदों ने,
मेरी चिड़िया को झुलसाया है....
हँसती- ठिठकती थी,
वह विचरित थी मेरे आंगन में,
पड़ी दृष्टि उस हैवान की,
खंडहर जंगलात में बदहाल,
वह मृत अवस्थित थी....
बनकर टूटा उस हैवान का कहर,
हाय! संपूर्ण शरीर पर किया प्रहार,
कोमल-सी थी मेरी गुड़िया,
वार पर वार,प्रस्थर प्रहार....
कोई हो स्वर्ण चाहे दलित,
हिंदू या मुस्लिम बेटी तो बेटी है,
क्षणभर भी वह दयनीय ना बना,
बना उसकी हालत दयनीय....
जुबान काट दी, कर ना सके बुलंद आवाज,
गर्दन तोड़ी, उठा देख सके ना समाज,
कमर पर प्रहार कर,तोड़ी हड्डी रीड की,
मेरी ना थोड़ी दरिंदों,तोड़ी हड्डी कानून की....
हाय! लचर कानून ,है अपराधियों को बढ़ावा,
आए दिन होता है,मेरी बेटियों के साथ छलावा,
हे! समाज के शुभचिंतकों,कानून के ज्ञानविदो,
सियासत के प्रहरियों,देश के नौजवानों,
कोई तो ऐसी पहल हो,
जो रौंद सके इन हैवानों के अरमानों को....
सोचे ना सके यह कोई दुष्कृत्य करने को,
एक सम्मानित समाज हमें बनाना है,
खेल ना पाए कोई मेरी गुडिया की आबरू से,
अब सख्त कानून बेटी हित में बनाना है....
"इन्द्राज योगी"


