मेरी अलमीरा खोल,
देखू मैं फरेब,
सने है जो स्याही में,
जो पड़े है वादों में,
कुछ पड़े हैं यादों में,
ढूंढू उपर से नीचे,
दराजो या भीतरी दस्ती मे,
टटोल अंगुलियों से,
खींच हाथों से बाहर निकाल फेंकू,
या फिर उन्हे रख और सहेजू,
ये दुखाते है मन को मेरे,
व्यथित करते मन को मेरे.....
"इन्द्राज योगी"


