मां शब्द सृष्टि,रचना स्वयं भू आकार,

अधीन गगन-अम्बर,तारिका संग सुधाधर,

क्रीड़ा मग्न आंगन तले,विमुक्त खेलता है मानव,

कवच ढाल रक्षा करे,मां सतर्क पिशाच-दानव,

योद्धा वीर निर्भीक-निडर,रहे तटस्थ समक्ष डटकर,

है मुस्कान सुक्ष्म क्षण-सी,निस्वार्थ प्रेम करे उझलकर...



जीवंत जीव करे दुलार,रूप मानव या पशुता योनि,

क्षण भर को छोड़े ना साथ,प्रयासरत रोकने को अनहोनी,

मां-मां-मां,जन्म-जन्म का साक्षात्कार,

हुआ प्रगट खोल चक्षु,किया प्रकृति का सत्कार,

बैठी जो मस्तिष्क में,थी अवधारणा एक ऐसी,

देख आज सजीव हुआ,मां तत्व की उपलब्धता ऐसी.



त्रिदेव की संकल्पना में,बसी मां शक्ति अंतर्ध्यान,

ध्यानमग्न-तपस्यारत,धरे मां शक्ति का ध्यान,

कोरी कल्पना मात्र नहीं,शिशु नवजात समान हम अबोध,

है मातृ शक्ति से ही संसार संपूर्ण,है मां से ही ज्ञान का बोध,

प्रथम पाठशाला इसकी,हम-तुम सब पढ़े है जिसकी,

पट्टिका-लेखनी पर उभरे गाड़े,अक्षर सुने जिव्हा की जिसकी...



श्रद्धा-मनु की हम संतान,प्रलय का शांत हुआ संताप,

दिया इड़ा ने दायित्व का मनु को ज्ञान,

प्रस्थान करों अब कर्म महान,

थी देवी मां,सृष्टि उद्भव हुई जब से,

ज्ञात न था,मनुष्य का अस्तित्व जब से,

आगमन हुआ है मृत्यु लोक पर मानुष,प्रथम शब्द मां मुखरित है,

निस्वार्थ प्रेम की प्रथम भाषा,साक्ष्य देखो यह दृष्टमान है...



नतमस्तक है देव-गण,नतमस्तक तत्व महान,

हो कोई मां से बढ़कर,चलो विचर कर आओ समस्त जहान,

दे सकता है,सुनो कौन दे सकता है,

ऐसा निश्चल,निर्मल प्रेम,

देती जो अपना सर्वस्व,

क्यों फिर विचाराधीन उसका अस्तित्व....



मां,शब्द एक,क्या गौर किया,

सांसारिकता को छोड़,

क्यों न आध्यामिकता पर जोर दिया,

मां का उच्चारण सहार्दिक,

मुखरित है हृदय भाव से,

विचलित मन में स्थिरता,

शांति ठहराव नेत्रों में....



चलते-फिरते,पीछे-पीछे,

कभी आगे तो कभी पीछे,

दाएं-बाएं,टेडे-मेडे,

नही ज्ञान सीधी चाल ज्यो भेड़े,

दिया है मां ज्ञान पर तुमने ऐसा,

भेड़ चाल नही पर विशिष्ट कुछ ऐसा....



मां निर्बल हूं,तुम्हारे बल के सामने,

मां कमजोर हूं,तुम्हारे दर्द के सामने,

मां मैं असहाय हूं,तुम्हारी मदद के भाव सामने,

मां मैं स्वार्थी हूं,तुम्हारे निस्वार्थ प्रेम सामने,

तत्व तुझ सा,जिसमे समाया

है ईश्वर से उच्च,उसने है खुद को पाया,

है तपस्या,बल,दर्द,हालत से,वही लड़ पाया,

जिसे मां की ममता ने है सहलाया...



आता है परंतु,रह-रह मेरे मस्तिष्क में एक विचार,

मानव में किंचित ही,पर भरा होगा स्वार्थ...



पशुता पहचान निस्वार्थतता की,

देखो विशिष्ट मिसाल ममता की,

बेजुबान है,बेअक्ल है,

सांसारिक भोग से दूर, बेशक्ल है,

पर परंतु इनका ममता भाव,

देखू जब भर आता भाव...



क्षणभर को ना छोड़े,पलभर करे न हृदय से दूर,

जिव्हा सहला प्रेम जताए,नेत्र मूंद स्नेह बिखराए,

करता तो प्रेम मनुष्य भी कुछ ऐसा,

समय पर ममता पर हावी होता,

जाता है ठुकरा दिया,प्रेम में आगमन जब होता पिया...



सब तो नही पर,

कुछ विशिष्ट ने है कर्म,

कुछ खास ऐसा किया,

या पढ़ा तुमने या पढ़ा मैने,

या गाया मैने या गाया तुमने,

मां का दिल,मां का दिल,

हो जाता है मानव निष्ठुर,

उत्पन्न होता प्रेम दूसरा,

हासिल करने को हो जाता बावरा,

समर्पण करता सर्वस्व अपना....



हां,पर मनुष्य को कहां,

सत्यता पर विश्वास होता,

वह तो आदी सदा रहा,

असत्यता,प्रदर्शनता का...



देश-प्रांत हो,राज्य विशेष,

शहर-कस्बे,गांव विशेष,

बने है सब बनाए गए,

मां के हाथों,रही है या मां विशेष,

एक पद राजमाता,होता राजधानी हर विशेष,

ले आज्ञा काज संपूर्ण,करते सम्राट-नरेश...



सम्मानित-सम्मानीय,हर युग हर काल,

कदाचित पर होता संदेह,कलियुग में है बुरा हाल,

भरा है इस युग में, मां का जीवन टीस भरा,

पुरित समस्त जीवन,तानो की रीस से भरा,

जो थी घर में पूजनीय,कर दिया उसे उस आंगन से पृथक,

या रखा भी तो उसको,बेकार-बदहाल उस आक समान...



भरे दिए गए है आज देखो,

बनाए गए जो आलय संभावनावंश,

वृद्धाश्रम में देखो बैचनी से,

रोता है रह-रह,

मां का दिल,मां का दिल...



दिवस जो आज मां का,

नही-नहीं,मां को सिर्फ एक दिवस,

मां ने स्वयं सृष्टि रचाई,

दिन दिवस देह रचाई,

हम सब उसके अनुयायी,

वश में बस हम प्रीत पराई,

कि जब उस प्रीत ने अगुवाई,

मां,हमने मां ठुकराई...



क्यों,क्या उचित कहां मैने,

क्या देखा यह अवगुण तुमने,

पशुता धर्म के मध्य,

कहो,चौपाया के मध्य तुमने,

मान लो अब तुम,

या मैं कहूं अब तुमसे,

गिरे हुए हो तुम सब से कितना,

गिना क्यों तुमने जनावर को इतना...



वह तो है कई गुना,बेहतर तुमसे,

या गिना तुम दो,मां कोई पृथक हुई हो इनसे,

मां ही तो सार थी जीवन की,

ढाल तलवार भी तो यही थी,

छीन तुमने निढाल किया,

बिन तलवार कहो,क्यों तुमने ऐसा वार किया....



दर पर जिसके दर्द ना आए,

भटका दिया क्यों,फिर उसको दर-दर,

कठोर तपस्या से जीवन को,

क्यों कर दिया बोलो,तुमने दर-बदर...



उठा रहा मैं अंगुली,आज तुम पर सीधी,

कोई घुमा दे थोड़ी इसको,मेरी ओर सधी,

मैं भी तो गुनहगार रहा हूंगा,

जीवन में तिरस्कार के इसके,

कभी तो किया होगा कटाक्ष,

उसकी मृदुल से स्नेह का,

या ठेस कुछ ऐसी,

पहुचाई होगी ना उसके मन को,

क्या बताओ प्राप्त कर जाऊंगा,

हृदय को कर दुखी इसके,

उस स्वर्ग को...



दिया मां ने सबको सब कुछ,

दे नही सकता स्वयं ब्रम्हा,

फिर था जकड़ा मैं किस भ्रम में,

यह तो नही विदित था मेरे धर्म में...



कौन बचाएगा अब मुझको और तुमको,

मातृ पाप के भागी हम,

नहा ले गंगा घाट-घाट,

या लगा के रट-रट राम-राम...



सुनो पर तुम ध्यान धरो,

अंतिम मेरी इस बात पर गौर करों,

जीवन में कुछ नही शाश्वत,

सिर्फ मां का प्रेम करे आश्वत....



बाकी है सब दुनियादारी,

मां ही सिर्फ समझदारी,

समझ का हाथ सबसे पहले,

बोलो मां ने ही तो फिराया,

उसी समझ से क्या बोलो,

हमने उसे दर-दर नहीं भटकाया....



क्यों दे हम प्रेम की देवी को दुत्कार,

हो न पाए भविष्य में इसका तिरस्कार,

देखो कमी इसकी जीवन में,

ऐसी की भर ना सके,

सुख समृद्धि हो कैसी...



चलो पूछते है उनसे,जो वंचित है इस सुख से,

रोते है विलापते है,मां-मां का राग अलापे,

देखो निकल बाहर चलों,

बिछड़ा बालक,बिछड़ा बछड़ा,

बिछड़न,बैचैनी उसकी आंखों में,

लोचन से बहते धारे,उसके अश्रु कपोलो पर...



चलो आज दिवस समर्पित करो,मातृ शक्ति को,

परंतु कल का दिवस,ना बन पाए इनका तिरस्कार दिवस,

पूजनीय है सर्व विदित है,ज्ञात है प्रबल शक्तियों को,

मांगी थी सुरक्षा प्राणों की,लगा गुहार अपनो की...


दुखी हो या संकट ने पैर पसारे,

अब बताओ कौन है,

जो भय से भाग गया नहीं शरण मां के,

राम-महादेव या देवगण,

मानुष क्या लायक मां शरण के....



मां तेरा दिवस सिर्फ संदेश मेरा,

पहुंच सके लेखनी से मेरी,

पा जाऊं सम्मान यही,

होगा किसके पास ऐसा....


कविता नही भाव है,

भाव जिनका अहसास मुझे,

नित-रोज महसूस किया तूने,

मां,मैने लिख दिया है संदेशा तेरे नाम,

लिखा मैंने मेरे और सब तेरे पुत्रों नाम....



है लिखा इस आश से,

ना अब कोई मां,कठिन राहों पर मिले,

मजबूर एक रोटी को मिले,

ना बैठी मिले चौराहों पर,

भिक्षा को बढ़ाते हुए हाथो को,

आंखों में पानी,ना दिखे बेबसी कैसी...



हे पुत्रों! आज इस पावन दिवस पर विनती है,

यह हकदार तुम्हारी खुशियों की,

लूटा दी इसने अपनी सारी खुशियां,

तुम्हे,तक़दीर तुम्हारी संवारने में,

फिर भी तुमने ना चिंतन किया,

एक क्षण भी चोखट बाहर निकालने में.....

“इन्द्राज योगी”