मैं चुनता तुझे औंस भर भी तो क्या,
मेरी छुअन भर से तू बिखर जाती,
मैं चुनता तुझे खिली धूप सा भी तो क्या,
तू काली बदली को अखर जाती,
मैं कितने दर्द तेरे दिल से चुनता,
अच्छा होता कि सलाईयां जोड़ खुशियां बुनता,
पर तू भी मुझसे उखड़ती चली गई,
मिल बांट समेटी थी जो,
खुशियां दामन से बिछड़ती चली गई,
मैने वादा किया था तुझसे,
तू और जिंदगी मेरी,
वादा खिलाफी में उलझती चली गई...
"इन्द्राज योगी"
