आज फिर महाभारत-सा पड़ाव नजर आ रहा है,
जमा स्थिर वही लश्कर नजर आ रहा है,
संभल जाओ ओ दुर्योधनों,
डगमगाने को इन्द्रप्रस्थ देखो,
हलधर आ रहा है....
जुटी थी सेना उस समय भी,
प्रांत-प्रांत देश-देश की,
ठीक जुटी है आज ऐसी,
कुरुक्षेत्र की रणभूमि जैसी...
था उसमे एक सारथी,
एक ही तो था पार्थ,
विजय भी अनिश्चित थी,
दिखता ना था कोई अर्थ....
बने है लेकिन यहां तो,
सारथी भी बहुत,
पर तुम ध्यान देना,
ले जाएं तुम्हें ना परमार्ग....
धर्मयुद्ध था महाभारत भी तो,
बैठे थे वे भी शांत,
होगा मन तुम्हारा अशांत,
बैठो पर तुम भी शांत.....
निष्कासित किया गया,
मांगे भी कहां मानी,
आया एक विचार मन में,
हक अपना लेने की ठानी....
अब तुम भी मांगे मनवाओ,
जो है सभी अमान्य,
उठो तुम कूच करो,
दिल्ली तक पहुंच करो....
बैठे तनाशाओ की ओर,
बढ़ो ओर बढ़ते चलो,
घर्र घर्र रथों की ध्वनि से,
थर्र थर्र थर्रा दो उन सिंहासनों को....
मन में उपजती है जब निराशा,
सहसा मनोबल है गिरता जाता,
दृष्टि कमजोर पड़ती है,
अभाव दूरदृष्टी का होता जाता.....
तुम ही में नहीं व्याप्त यह,
व्याप्त उनमें भी जो योद्धा थे,
क्षण भंगुर बने वे सभी,
योद्धा बनाने में लगे एक जन्म जिन्हें....
आशाओं को हावी होने दो,
निराशा को हवा होने दो,
हम जीतेंगे यह संग्राम,
हमारा है यह भ्रम तो,
हमे यह भ्रम होने दो....
देखो किसानों आज स्थिति ऐसी आई,
हुआ था जो भीषण महाभारत जैसी आई,
पर नहीं करना हमे नरसंहार,
शांति से शांति का करेंगे भेंट उपहार....
किसान तो जीवन ही है कठिन,
चुना ही तुमने है जीवन कठिन,
कभी सामना मौसम से,
कभी सामना गरीबी से....
फिर भी नहीं विचलित हों पाएं,
है विकास के भागीदार बनते आएं,
मिला सम्मान कभी ना,
अपमान सदा ही सहते आएं....
बारीकियों को समझो,
गौर करो हर गलती पर,
कोई बहुरूपिया घुस ना जाएं,
भेष बदल तुम्हारी सेना में.....
छिन्न-भिन्न कर देगा ये,
सभी नीतियों-योजनाओं को,
विश्वास को अभिमान को,
सेना के बीच स्थित साहस को...
पहचानो मार भगाओ उसे,
है किया यह दुस्साहस जिसने,
सेंध मार ना पाएं कोई ,
बैठा दो पहरे पर निगाहें अपनी.....
झुठलाएंगे,बतलाएंगे,
बतलाएंगे,झुठलाएंगे,
आएंगे प्रलोभन कई,
पथ से बार-बार भटकाएंगे.....
निडर बनो पर तुम सभी,
है मंजिल देखो नजदीक खड़ी,
बस स्पर्श को क्षण भर की दूरी,
है चंद पल की घड़ी अड़ी....
हौसला मत हारो,
फिर से एकजुट हो जाओ,
एक होकर अटूट बनो,
शक्ति बन टूट पड़ो....
" इन्द्राज योगी"


