काले कानूनों से लड़ता हूं,

हर हाल में मरता हूं,

मैं किसान,

धरती से मेरा मोह न्यारा,

मिलता वसुधा से मेरा उनियारा...


सर्दी-गर्मी से लगाव गहरा,

फसल को मेरी देती पहरा,

धरती का श्रृंगार मेरा दायित्व,

है तब तक ही मेरा अस्तित्व....


ज्यादा कुछ ना कमा पाया हूं,

बस इतना ही है पास मेरे,

दो जून की रोटियां में,

खुशहाल परिवार बसाया हूं....


होने को तो भण्डार पड़े,

हूं अन्नदाता लेकिन,

पालनहार-सा कर्तव्य मेरा,

रिक्त ना होंगे भण्डार मेरे....


कर्म छोड़ा कभी ना,

ना पड़ी भूमि मेरी वीरान,

बंजर को अपने पसीने से सींचा,

खड़े करें खेत-खलिहान....


है पहने हरियाली का भेष,

देते भाव सद्भावना का,

खुशहाली हर्षोल्लास का....


मेरी जीवनी इतनी सी,

हो अन्याय जब-जब,

दबाया जाता है हर बार,

सामंत जमीदार या फिर हो सरकार....


पहुंचता हूं सुनाने को अपनी व्यथा,

ऊंचे आसिनों पर बैठी सत्ताओं को,

कोई भी हो दल या बल,

सभी अपनी रोटियां सेंके,

मेरी पराली अस्थमा करें,

औद्योगिक धुएं से हुक्का फुके.....


यह इतिहासों से चलता आया,

हर कोई मुझ पर राज करता आया,

मार के चाबुक पीठ पर,

करके मुझे हलाहल,

खिचवाएं मुझसे कई हल....


जब भी पहुंचा सड़क पर,

अपनी आवाज उठाने को,

दमनकारी नीति अपनाई,

मेरी आवाज़ दबाने को....


भिगोने को मेरे अरमान कई,

पानी की बौछारें करवाई,

कमजोर निर्बल इस शरीर पर,

जवानों से लाठी बरसाई....


नहीं हारा था,ना हारूंगा,

हो मौसम,चाहे सरकार कोई,

अरे! आए कई गए कई,

मौसम क्या,सरकार कई....


किसानों पर आश्रित है,

किसान ही आश्रय,

होगा ऐसा कौन यहां,

अतिरिक्त अनेक दबाव सह जाए,

मौसम,गरीबी और सत्ता,

सबको एक साथ सह जाएं....

"इन्द्राज योगी"