जब सब ने छोड़ा साथ मेरा,
था घूमता रहा मैं बेचारा,
आवारा की ही संज्ञा थी,
ना था कोई और चारा.....
मैं राह तकता,
मेरी दो छोटी आंखों से,
मैं बात करता,
मेरे दो कोमल अधरों से....
था तन मेरा अकेला,
था मन मेरा अकेला,
रिश्तों नातों का ना था झमेला,
हृदय भी हो गया हठीला,
मन मेरा गाता,
तन मेरा सुनता,
चल अकेला,
चल आ चल अकेला.....
भीड़ मिली थी,
मुझे उस राह,
मिली नहीं,
जहां मुझे पनाह,
मिली हर दर से नाह,
कैसी थी वो भीड़ वाह.....
मैं,मेरा,हमारा,
काहे राग अलापे,
क्यों लगाए फेरे,
आ बैठ पास मेरे,
देख फिर कौन है तेरे.....
जब मैं फंसा इस भंवर में,
उस पहले का तू सार सुन,
बतियाने को यार,
खिलखिलाने को प्यार,
साथ निभाने को परिवार,
था क्या नहीं,अब है नहीं......
जब छूटा सब कुछ,
ख्याल यह मन में आया,
मैं मृदुल हृदय वाला,
क्या होगा मुझ से छलावा......
बैठा क्षणभर सोचता,
उठता चलता फिर बैठता,
असहज सा कुछ चुभता,
तन में नहीं मन में मेरे....
आस्तीन जब टटोली,
कलम अंगुली में जा फंसी,
अब मस्तिष्क मेरा चकराया,
याद आया जो कुछ मैंने भुलाया,
बल बूते जिसके मैंने कमाया,
हां कहां क्या मैंने गंवाया.....
हां ये ही वह कलम,
कागज हो फिर ओर कोई,
नव पथ पर सफर शुरू करू,
अब मैं असंभावनाओं से क्यू डरू......
लिखूं हां मैं लिखूं,
अरमान मेरे,ख्याल मेरे,
दर्द मेरे,दुख मेरे,
रैन मेरे,सवेरे मेरे....
इन्हीं में गुजरे बाकी जीवन,
इनके सिवा यहां ना कोई मेरे,
जब मैं हारा,
तब छूटा सब का सहारा,
कागज कलम ही बने सहारा,
अब इन्हीं बीच अपना गुजियारा.....
"इन्द्राज योगी"


