मन में दया का भाव छलकता है,
दिल मेरा जहां भी पसीजता है,
उस चाय की थड़ी वालें बच्चे पर,
मैली-फटी उसकी बनियान पर,
हां कहीं तो दिल पसीजता है मेरा....
उस दहाड़ी वाले मजदूर पर,
पैरों में टूटी उसकी चप्पलों पर,
मध्यांतर में रूखी-सूखी उसकी रोटियों पर,
हां कहीं तो दिल पसीजता है मेरा....
सड़क किनारे बैठी उस बूढ़ी मां पर,
दुआ को आगे बढ़ते उन हाथों पर,
हां कहीं तो दिल पसीजता है मेरा....
ठेले खीचती उन बूढ़ी उम्मीदों पर,
दमा भरते उस तन पर,
आराम को छांव ढूंढते उन क्षणों पर,
हां कहीं तो दिल पसीजता है मेरा....
लकड़ी बीनती उस स्त्री पर,
जले तो पके की आस पर,
शरीर पर दुगुने भार पर,
हां कहीं तो दिल पसीजता है मेरा....
दर-दर भटकते उन कदमों पर,
रोजगार पाने की लालसा पर,
डिग्री उठाए फिरे उस पीठ पर,
हां कहीं तो दिल पसीजता है मेरा....
नन्हे कदमों पर,
नन्हे हाथों पर,
जकड़े उन हालातों पर,
जो मंडराते है सड़को पर,
मायूसी भरे उन चेहरों की मजबूरी पर,
गुब्बारे ले लो बाबूजी,
कहने वाले उन होठों पर,
हां कहीं तो दिल पसीजता है मेरा....
"इन्द्राज योगी"


