हो कुछ ऐसा इस होली,

भरे खुशियों से सबकी झोली,

मुखरित हो मिठास भरी बोली,

लगे हो जैसे किसी ने खुशियों की पोटली खोली....


भर मुष्टिका में अंबीर,

फेंक रहा हवा प्रवाह में,

सब चेहरे रंग-बिरंगे,

खिल रहे हो जैसे कई फूल चमन में...


गटक ग्लास भांग लस्सी,

फिर फिर आए हस्सी ही हस्सी,

झूमे कमर पर लगा हाथ,

गाए फिर जोगी सा रा रा रा,

रंगोत्सव की है वाह!क्या मस्ती....


घूम रही है गली-गली,

कन्हैयाओं की टोली,

ढूंढ रही आंखे,

प्रियतम संग खेलने को होली....


आंखों में भाव है,

आत्मा में स्पर्श,

खेलूं मैं भी उन संग होली,

मारती है जो अंखियों से गोली....


गेहुआ रंग,कद में ऊंची,

आएगी जो कभी, जद में सच्ची,

खेलूंगा तब मैं होली,

जब मिलेगी वो मुझसे इस होली....


भोर भए आयेगी जब,

जल संतृप्त केशो संग,

कंधे पर होगी चुनर,

रखूंगा कुछ कशीदे चुनकर......


रख दोनो हाथो में गुलाल,

समय का बुन कर जाल,

छू कर दोनो गाल,

मैं तो कर जाऊंगा लाल.....


यह ही तो प्रेम का प्रतीक है,

खेली थी जो होली,

राधा-कान्हा थे प्रेम की ही बोली,

थे एक-दूसरे के हमझोली....


आगे-आगे दौड़ती राधा,

पीछे भागे कान्हा गुलाल उड़ाए,

भर पिचकारी यमुना नीर से,

सब गोपियों की चोली भिगोए...

•इन्द्राज योगी•