मेरे घर-आंगन को महकाती है,
अपने सभी कर्तव्य निभाती है,
आई थी मेरे आंगन जब,
पड़े थे शुभ पद उसके तब....
शुभ-मंगल का आगमन हुआ,
दिन-दिन खुशियां बढ़ती रही,
आते थे जब त्यौहार-पर्व,
वह प्रात:सवेरे ही काज में जुट जाती थी,
तैयारी करती उत्सव की जोर-शोर से,
तभी सही कहते हैं लोग,
घर तो गृहलक्ष्मी ही बना पाती है.....
होगा कैसा उस घर का आंगन,
जहां नहीं है गृहलक्ष्मी भाग,
खुशियां होंगी ही नहीं वहां,
पूर्ण होता होगा ना काज....
औरत-स्त्री स्वरूप आदिशक्ति महान,
है साक्षात देवी स्वरूप महान,
दिवस को उत्सव में बदलती,
है उत्साह का ऐसा ज्ञान....
गृहलक्ष्मी है सौभाग्य भाग,
है आई जिस घर होते पूर्ण काज,
है विडम्बना लेकिन सोच,
अलग कुछ लोगों की निम्न....
करते हैं हिंसा सदा रखते,
अपमानित मान,
गृहलक्ष्मी का मान,
सदा ही रखें उच्च महान....
वेदों में लिखा है पूजा होती जहां,
देव रहते वहां,
देवगण सदा करते आए,
ध्यान सदा जिसका,
फिर मनुष्य को कैसा दंभ,
करता जो अपमान सदा....
होता ही नहीं कोई सफल,
बिना अनुमति,आज्ञा के उसके,
होता कोई उत्सव-पर्व,
पूर्ण करती गृहलक्ष्मी सदा,
है देवियों में सर्वोच्च्य स्थान जिसका सदा....
परिवार को सहेज कर संगठित रखती,
पूंजी-पूंजी बचा अपने परिश्रम से सींचती गृहलक्ष्मी,
है योगदान सर्वोत्तम इसका,
मकान को घर बनाने में...
अब इसके जीवन में फैले,
अंधियारों को चलो मिटाएं,
लाएं इतनी खुशियां इसके आंचल में,
इसकी जिंदगी भी जगमगाए....
खिलता रहे चेहरा,
दमकती रहे मुस्कान होठों पर,
करे समझौता ना इसकी खुशियों का,
है धन्य भाग हमारे गृहलक्ष्मी,
लक्ष्मी से इस स्वरूप से,
प्रकाशित है घर खुशियों का....
"इन्द्राज योगी"


