एक दिन हम मिलेंगे,
नफरतें जहां अपना,
दम तोड रही होंगी,
प्रेम की कोपलें,
प्रस्फुटित होने को,
मचल रही होंगी,
हां! जब हम मिलेंगे....
क्षितिज से ढल रहा होगा सूरज,
और सांझ अपने,
अंतिम चरण पर होगी,
रात बेसब्री से,
हमे मिलाने को,
आतुर होगी,
हां! जब हम मिलेंगे....
शांत समंदर में,
एक शोर उठेगा,
लहरे आगमन को हमारे,
उमड़-उमड़ तट चूमेंगी,
और पंछी तेज कलरव में,
अपना सांझ गान गायेंगे,
हां! जब हम मिलेंगे....
हवाएं अपना रुख मोड़ लेंगी,
बहेगी वो विपरीत दिशा में,
और आंचल को तुम्हारे,
लहराएंगी अपने प्रवाह से,
उड़कर मेरे साथ भेजने को
हां! जब हम मिलेंगे....
एक महीना सावन का,
विहग गीत गायेंगे,
बारिश संग झूम-झूम,
शाखों पर झूल-झूल,
हरियाली धानी में,
तुम भी अपनी चुनरी,
लहराओगी,
हां! जब हम मिलेंगे....
तारों की संगणिकाओं में,
विखड़न की क्रिया का ,
हो संचार,
गिरेंगे जब वो बन पुलकित,
आंखों पर रख तुम्हारे हाथ,
मैं हृदय से तुम्हे मांग जाऊंगा,
हां! जब हम मिलेंगे....
वो पर्वत से बहते झरने,
झरनों पर भींगे तेरे पैरों से,
टपकती बूंदों को,
मैं होंठों से चूम जाऊंगा,
हां! जब हम मिलेंगे....
हम जरूर मिलेंगे,
प्रेम की ज्योत में,
बाती बनकर,
और उभरेंगे,
बनकर ज्वाला,
तू दीवानी,
बनकर मैं दीवाना,
हां! जब हम मिलेंगे...
बारिशों की बूंदे,
फुहार बन,
गिरेगी चेहरे पर मेरे,
प्रहार भीगती जुल्फों का,
होगा चेहरे पर मेरे
हां! बूंदे वो बाल-बारिशों की,
भीगा जाएंगी चेहरे को मेरे,
हां! जब हम मिलेंगे....
एक विरहा की अगन,
सुलग रही होगी,
हृदय में मेरे,
जब हृदय से तुम मुझको,
लगाओगी,
तब तुम इस अगन की तपन,
का अहसास पाओगी,
हां! जब हम मिलेंगे....
हां! लताएं लचक रही होगी,
मोर पंख फैला,
नृत्य कला में,
मग्न होंगे,
कोयल शाख पर,
बैठी कूक रही होंगी,
हिरण कुलाचे भर,
धरा को नाप रहे होंगे,
झरनों के प्रवाह,
धुंआधार शोर कर रहे होंगे,
पेड़ शाख-सी,
बांह फैला,
स्वागत में आतुर होंगे,
हां! जब हम मिलेंगे....
भू धरातल पर,
कोई सीमा ना,
निर्धारित होगी,
तेरे-मेरे प्रेम की,
ना दर्प होगा,
इस समाज की,
जाति-पाति का,
हम कुचलेंगे मिलकर,
इस सर्प का शीश,
हां! जब हम मिलेंगे....
बिछड़ जायेंगे जब,
हम तुम से,
घटाएं आसमान से,
अश्रु बहाएंगी,
तेरी मेरी आंखों की बेबसी,
बरस-बरस छुपाएंगी,
वेदना बन दामिनी,
चीर बादलों को,
धरती छूने आएंगी,
हां! जब हम मिलेंगे....
एक रात पूर्णमासी की,
रात वह अमर चांदनी सी,
अपने शीतलता से,
रात अम्बर सजाएंगी,
अमृत सा सुख,
मुझ पर तुझ पर,
चांद चांदनी बरसाएंगी,
हां! जब हम मिलेंगे....
हो जाओगी जब तुम उदास,
दुखों की कर अनुभूति,
मैं साहस बन उभरूंगा,
दे साथ हमदम मेरे,
ये जीवन तुम्हारा,
प्रियें! दुखों से पार लगाऊंगा,
हां! जब भी हम मिलेंगे....
हां पर अंतिम शब्द,
अब सुनो मेरे,
कुठाराघात होगा जब,
इस निर्दयी समाज का,
मृदुल हृदय पर तुम्हारे,
तो तुम कर जाना हृदय को कठोर,
कुछ पत्थर-सा बेजान,
देंगे साथ जीवन में तुम्हारा,
ये नदी-झरने,
पर्वत,हिरण,पेड़,लता-फूल,
जंगल,चांदनी,
पर साथ ना देगा,
तुम्हारे अपने समाज का मानव,
और करेगा प्रेम पर हमारे,
कई छल,ईर्ष्या,घृणा से प्रहार,
छीन लेगा फिर एक दिन,
तेरे मेरे प्राण,
हां! जब हम मिलेंगे.....
•इन्द्राज योगी•


