कांच के गिलासों के टकराने की आवाज सुन कर उठ जाता है,

चाय के दुकान का वो छोटू,

लब खुलने से पहले ही चुस्की पहुंचा देता है,

चाय के दुकान का वो छोटू...


मैले कुचेले कपड़े पहने,

गरीबी में मां के यही तो गहने,

हताशा सी निराशा के साथ,

मिलाता है कई बाबुओं की जूठन से हाथ,

चाय के दुकान का वो छोटू...


छींके में जमा गिलास कर एक एक,

अव्यवस्थित खुद को करता है,

चाय चीनी दूध के साथ,

उसका मन भी उबलता है,

और कुटता है अपनी हर इच्छा को,

अदरक,इलायची के साथ,

चाय के दुकान का वो छोटू...


अरमानों की दुनिया देख,

गिलासो से धुली हथेलियां देख,

वह उठाता है पतीले भर चाय,

बांट बांट गिलास गिलास,

वह मन ही मन होता निराश,

बेजान सी अंगुलियां में,

वह छीका फंसा आवाज लगता,

"बाबूजी गरमा गरम चाय.?"...

"इन्द्राज योगी"