देश में व्याप्त अराजकता का माहौल,
आक्रोश रहा किसानों मे खौल,
सभी मांग अपनी मनवाए,
हो कोई भी हथकंडा हम अपनाए...
सरकार के विरोध में दर-बदर,
ये तो भटके है,
शुरू से लेकर अब तक,
बैठक-बैठक पर ही बस अटके है....
आज बस धैर्य का सब्र टूटा,
किसान में आक्रोश फूटा,
किया जब दिल्ली कूच,
मैंने एक रूप ऐसा देखा सच मुच
बंद प्राचीरों से झांक रहा,
कम किसानों को आक रहा,
धैर्य बदला दोष में,
शांत मन रोष में....
जब की दिल्ली फतह,
थर्रायी सतह,
अब किसानों ने भेष बदला,
ठानी अब मन में लेने की बदला.....
क्या थी साजिश,
एक थी ऐसी भी साजिश,
झुकाए देश का मान,
राष्ट्रीय पर्व पर ही हों,
भारत का अपमान....
गुणगान जो सब गाते थे,
दक्ष-प्रदर्शन दिखाते थे,
वाह वे ही मखौल उड़ा रहे,
जिनके पांव भी उखड़ रहे....
भीड़ में लहरा रहे थे,
तलवार,
प्रहार पुलिस पर कर बार-बार,
घायल किया आघात पहुंचाया,
लहूलुहान था देश का किसान-जवान.....
पहुंच गए लाल किला,
फतह की खुशी में झूमे खिल खिला,
लांघ दिया उन प्राचीन प्रचीरों को,
जो खड़ी अटल स्थिर को....
इस बार अराजकता की सीमा लांघी,
भीड़ ने अब दीवारें फांदी,
लहरा रहा था राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा,
आंखों में अब वह चुभने लगा....
करी चढ़ाई आक्रमकारियों सी,
क्षण भर में पहुंचे तिरंगे के पास,
उतार फेंक दिया जमीं पर,
देखो यह अपमान राष्ट्रीय ध्वज का,
राष्ट्रीय पर्व पर.....
चलों फिर करे विचार,
संझोए है जो स्वपन सभी ने,
क्या होंगे वो साकार,
की कल्पना सभी ने....
क्षुब्द है देश देख कर,
अपने नागरिकों का यह रूप देख कर,
क्या पनप रहा मेरे देश में,
कौन बस रहा ये कैसे भेष में....
नीचा दिखाने की होड़ में,
तुम भी आए उन्ही आक्रमणकारियों की दौड़ में,
किया जिन्होंने क्षत-विक्षत,
मेरे भारत मेरे देश को.....
इन उपद्रवियों भेष में किसने कहां है,
किसान है,
लो मैं कहता हूं,
सब के सब हैवान है....
आज देखो विश्व पटल पर,
नया भारत उभरा है,
आश्चर्यचकित विश्व संपूर्ण,
भारत क्या अभी भी है अपूर्ण....
हवा दे दी थी तुमने,
होने वाली थी अनहोनी,
सोच तुम्हारी कद से तुम्हारे,
थी बौनी,थी बौनी....
प्रतिपक्ष बनो,
विपक्ष बनो,
पर उससे पहले,
देश भक्त बनो.....
रखा है हमने अपने देश को,
अग्रणी सभी से,
विकासरत है निरन्तर,
आजाद है जब ही से....
अब इसके स्वाभिमान को ठेस मत पहुचाओ,
शिथिल है आत्मा इसकी,
इसे मत झुलसाओं,
भोले भाले वासी है यहां के,
अब इन्हें ना बरगलाओ....
"इन्द्राज योगी"


