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अंकुर बन सिंचित हो जाओ...

अंकुर बन सिंचित हो जाओ,

संकल्प की वीर भौम पर,

शीश उठाकर अंकुरित हो जाओ,

ह्रदय में उपजी विशाल वेदना पर,


सहों! सहनीय-सी प्रवृति तुम्हारी,

कितनी ही पीड़ाएं समेटे प्रकृति हमारी,

ऊंचाई से उठो, बनो तृण गिरि का,

बरसो बन बादल शिख गिरि का,

पार करो बाधा निज जीवन,<

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