अकेला था,अकेला ही रहा,

ना मंजिल मिली,ना कारवां,

लक्ष्यों में ही रहे उलझे,

पथ मिले ना सुलझे,

आस के थे जो दीप सभी,

जले सभी मंद-मंद से,

लगे उम्मीद की ज्योति भी बुझे,

बढ़े कदमों से आगे,

तन थका चुर हारा,

उदर कामयाबी की भूख का मारा,

होंठों को प्यास ना,

परिश्रम फल के रस की आस,

हां,परिश्रम फल के रस की आस....

"इन्द्राज योगी"