आज फिर मन है,समाज पर अंगुली उठाने का,

पनपी है इसमें जो बुराई,सामने उन्हें लाने का,

यूं ही ओढ़े जो बैठा है समाज,

आधुनिकता का चोला,

आज मन है उतार फेकने को दिखावे का यह चोला,


दिखावे की आड़ में प्रगति पर बैठा ये,

बांध पांव चलने को कहता ये,

उड़ने को विस्तृत गगन दिखाता ये,

उड़ते ही पंख दबोचने को दौड़ता ये,


हां!अब झूठी अफवाह,तुम ना फैलाओं,

झूठ की बुलंदी पर अब,इसे ना बुलंद बताओ,

सत्य पर है जो आधारित,वह तुम कथा सुनाओ,

होते है जो ऐसे समाज में,वह तुम काण्ड बताओ,


हां! सदियों पहले का एक समाज,

मैने पढ़ा था कभी किताबों में,

नही था वह कोई प्रसिद्धि प्राप्त,

था क्रूर-सी लिप्साओ में व्याप्त,


था करता नित सुबह,

नारी को अपमानित,

शब्द-शब्द-अपशब्द से उसके,

थे सभी अमर्यादित,


हां! कुछ ऐसा ही समाज आज है,

हां परछाई इसकी भी उसकी सी,

स्याह है,

मैं ना मानूं उन्नति इसकी,

ना मानूं उसकी,


कैसा है आधुनिक समाज,

देख गगन चलता,

मूंड उठाए,

ठोकर खा पड़ता,

दांत तुड़ाएं,


नारी की स्थिति पर,

पहले था जो दांत पिसता,

आज भी है देखो,

आंख मुंदता,


एक आश पर,

आगे बढ़े है नारी,

सहे है जिसने,

कष्ट इस समाज में भारी,


कुछ उस समाज की,

रीतियों ने जकड़ा,

कुछ इस समाज की,

आधुनिकता ने पकड़ा,


पहले भी नोची गई,

मैं तन से,धन से,

अब नोची जाती है,

आशाएं मेरी हौसले मेरे,


अब बताओ किस,

समाज से लड़ूं,

इससे या उससे,

कहों अब किससे,


करते है जो बुलंद वादे,

धम्म से गिर धूल चाटे,

हाय! संस्कृति के नाम पर,

हर रोज मारे चाटें,


कहो हे! कायर पुरुष,

क्या यही है आधुनिक समाज,

आह! है तो यह कैसा समाज,

ऐसा ही तो था,

जो हम आई गुजार,


अब भी पिंड ना छूटा,

उन यातनाओं से,

जो थी असहनीय,

आह! यहां भी भाग फूटा,


अशिक्षा उस निरक्षर समाज की,

पड़ी हम भारी

कभी डायन,कभी कुंठा,

कभी मार कुल्हाड़ी

मिटा दिया गया टंटा,


उस समाज की एक अवधारणा,

बेटी है पत्थर समान,

जो गर्भ से बच कर निकली,

फिर माटी गर्त से ना बच पाई,


हां! बात अभी चल रही,

हां! उसी समाज की,

जो माटी गर्त से बच गई,

ना भेदभाव से मैं बच पाई,


धब्बा तो है अब उस समाज पर

जिसने मुझे अधेड़ संग बिहाई,

जब आया जौबन मुझ पर,

अधेड़ पति ने सांस गवाई,


अब सुनो इस बैरी समाज की करतूत,

पति संग मेरी भी चिता सजाई,

ना चाहते हुए भी मुझको,

ऊंची-सी लपटों बीच जलाई,


जो मैं बची उन लपटों से,

कर दिया मुझे केश विहीन,

खाने को ना तृण दिया,

छीन जीवन का उजाला मुझसे लिया,


था देखो कितना निर्मम,

वो समाज मेरे लिए,

ठीक है आज भी वैसा

यह समाज मेरे लिए,


नग्नता लिए आंखों में,

चारों और घूमे वहशी,

कैसे बचूं किस-किस से बचूं,

हाय! अबला मैं कैसी,


नाबालिक क्या नवजात,

अब स्त्री यहां सुरक्षित नहीं,

तब थी खतरे में,

आज भी चारों और खतरे में,


यहां हर जगह सेंध,

नही ज्ञात,

किस दरिंदे से नोची जाऊं,

नही ज्ञात


उठते मुझ पर,

है सवाल,

पोशाक परिधान,

और शिक्षा पर,

बेटी है बेटी ही रखो,

बेटी है मर्यादा में रखो,


हां! ये कथन है,

इस आधुनिक समाज के,

जो पीट रहा ढोल,

अपने उत्थान का,


रखे है सुरक्षित मेरे,

कानून सभी,

दिए गए जो,

सुरक्षा को सभी,


पर दुखद: काम,

ना कोई आया,

इज्जत रौंदी,

सड़क से शहर तक,


कहने को तो आता,

एक दिवस महिला दिवस,

पढ़ो पर उस दिन का भी अखबार,

भरा पड़ा कई इज्जत नीलाम,

सरेराह,सरेआम,


पर ये समाज,

क्रूर है,जालिम है,

अत्याचारी भी उससे ज्यादा,

इज्जत नीलाम कर मेरी,

मौत के घाट उतारता है,


मार पत्थर चेहरा,

क्षत-विक्षत करता है,

या डाल तेल,

आग लगाता है,


जिंदा क्या मैं,

इस समाज में,

मृत भी सुरक्षित नहीं,

इस समाज में,


कहो क्या दावे,

इस समाज के,

सत्य है,

सत्य नही है,

उस समाज की,

नारी इस समाज से

दुखी है प्रताड़ित है......

★इन्द्राज योगी★