(कहानी)

भाग - १


ये बस वाले भी ना बसों को सवारियों से खचाखच भर कर चलाते है। जहाँ एक कदम रखना भी संभव नहीं होता वहां वे और पीछे खिसकने को कहते रहते है।इन्हे तो बस सवारियों की पड़ी है सवारियों को हो रही पीड़ा से इन्हे क्या।


ये शब्द मालती के थे जो आज शहर से मेरी साथ हमारे मायके जाने वाली थी। मालती से आज मेरी कई वर्षो बाद मुलाकात होने वाली थी। हम दोनो ही बहने शहर में कुछ ही दूरी पर ब्याही थी। मेरे पति के टैक्सटाइल का व्यवसाय होने के कारण मुझे भी उनके साथ सूरत विस्थापित होना पड़ा।


मैं ऑटो से बस स्टैण्ड पहुंची। मालती मुझे कहती है रमा इतना विलंब क्यों हो। मैं कितनी देर से तुम्हारी राह देख रही हूं। एक तो बस स्टैण्ड पर ये हो-हल्ला ऊपर से अपने गांव की बस बैरी कितने देरी से है।


मैं मालती से कहती हूं सूरत से आने के बाद शहर में स्थित घर को मैने व्यवस्थित रूप से जमा कर आई हूं।सभी सामानों पर धूल जमी पड़ी थी मानो वह प्रतीत करवा रही थी कि कोई मानुष यहां आए तो ये गर्द उड़े। आखिर मनुष्यों बिना घर कैसा। वह केवल पत्थर और सीमेंट से बनी सरंचना ही नजर आती है।


मालती:- हां! जब गृहणी ही घर पर ना हो तो कैसा घर। आँगन झाड़ू लगाने को उसे मुंह उठाए तकता होगा। आँगन की तुलसी जल विहीन होकर सुख चुकी होगी।सभी पौधे व फूल बिना देख रेख के सुख चुके होंगे।


भाग - २


रमा:- हां! ऐसा ही होता है।


मालती:-तुम चाय पिओगी? हमारी बेंच के ठीक सामने वो थड़ी देख रही हो? पूरे बस स्टैण्ड पर उस थड़ी वाले की चाय प्रसिद्ध है। उस मुन्ने को आवाज लगाती हूं।

ओ!मुन्ना चाय लाना रे।


मालती:- जितना बस का सफर नही थकाता है उतना तो बस के लिए किया गया इंतजार थका देता है।यहां का वातावरण तो देखो कितना शोर गुल है। एक तो ये फेरी वाले ऊपर से ये पानी की बोतल वाले।


रमा:- सब पेट लिए कर रहे है। इनकी आजीविका का यही तो एकमात्र साधन है जिससे ये दो जून की रोटी का प्रबंध कर पाते है।


मालती:- गरीबी कुजात होती ही ऐसी है। रमा मेरी शिक्षा तुम से कम ही हो पाई क्योंकि घर में बड़ी होने के नाते मुझे परिणय सूत्र में जल्दी बांध दिया गया।

हां! पर यह नहीं कि मेरी मर्जी के विरुद्ध हुआ है।

हां! उस समय समाज ही इस तरह का था। बाबूजी ने रिश्ता देखा बस वही अपना जीवन साथी हो गया।


रमा:- हां! उस समय समाज में यही व्यवस्था थी।लड़कियां ठीक से पढ़ भी कहां पाती थी। लड़की 14 -15 साल की हुई नही कि मां-बाप को लड़की के हाथ पीले करने की चिंता सताने लगती थी।


मालती:- हां! ऐसा ही होता था। अगर तुम मुझ से बड़ी होती तो मैं भी तुम जितना पढ़ पाती।

काश! पर अब गृहस्थी में ऐसी व्यस्त हूं कि पढ़ाई शब्द जेहन में आता भी नहीं।


रमा:-हां! हमारी समाज व्यवस्था के कारण आज कितनी ही लड़कियों के सपने विश्व विद्यालय जाने की चाह में बिखर चुके है। कितनी ही प्रतिभाएं ऐसी थी जो अध्ययन कर देश के लिए कितना कुछ करना चाहती थी।

आज मैं मेरे पति का हाथ अगर काम काज में बंटा पाती हूं तो यह मेरी शिक्षा ही तो थी।आखिर समझ की मात्रा पुरुषों की अपेक्षाकृत ज्यादा होती है हम महिलाओं में।


भाग -३


मुन्ना:- लो आंटी चाय! हमारे स्टॉल पर बनी गरमा-गरम बस स्टैण्ड की प्रसिद्ध चाय।


रमा:-(टकटकी लगाकर) बच्चे की मासूम शक्ल को देखकर कहती है बेटे बस यही काम करते हो या इसके अलावा पढ़ते भी हो?


मुन्ना:- हां आंटी पढ़ता हूं। जब बसे चली जाती है और बस स्टैंड खाली हो जाता है तो मास्टर साहब द्वारा दिया गृह कार्य निपटा लेता हूं।


रमा:- पढ़ने का इतना ही जुनून है तो फिर यहां क्या कर रहे हों।


मुन्ना:- आंटी जी! यहां काम करता हूं तो कुछ पैसे मिल जाते है।मेरी किताबें आ जाती है। जिससे मेरी पढ़ाई पर कोई अड़चन नहीं आती है।


रमा:- तुम्हारे पापा क्या करते है?


मुन्ना:-आंटी जी! बापू एक मौसमिय दुर्घटना अर्थात आकाशीय बिजली गिरने से मृत्यु को प्राप्त हो गए।

रमा:- आह! दुख:द माफ करना बेटे। तुम्हारी माताजी क्या करती है?


मुन्ना:- मां कहती है कि जो बिजली तुम्हारे बापू पर गिरी थी उसी समान एक बिजली हमारे घर की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ी है। तुम्हारे बापू ही तो हमारा एकमात्र सहारा थे।अब हमारा जीवन गुजारा बहुत कठिन हो गया है। मैं अब गांव के जमीदार ठाकुर विश्वनाथ सिंह के यहां खेतों में मजदूरी करूंगी। तुम हमारे सोहन काका जिनकी दुकान शहर के बस स्टैण्ड पर है तुम वहां काम करना जिससे हमें कुछ रुपए मिल सके। मैं तुम्हारी शिक्षा को हमारी गरीबी की वजह से बीच में अवरुद्ध नही करना चाहती।

मुन्ने की बात सुन सहसा रमा के आंखों में पानी तिरने लगा।


मालती:- रमा तुम काहे इतनी चिंता में डूबे जा रही हो।पता नही इस दुनिया में कितनी चाय की स्टॉल है और पता नही कितने ही मुन्ना वहां काम करते है।सभी की स्थिति विचाराधीन ही तो है। बेचारों को कहां इतना प्यार मिलता है। थड़ी मालिकों से भद्दी गालियां और ग्राहकों का रौब कितना सहते है बेचारे ये बच्चे।


रमा:- हां! बात तो सही कह रही हो। इन बातों से प्रतीत होता है कि तुम भी इस सख्त रवैए के पीछे मृदुल हृदय छिपा रखी हों। तभी तो इस बच्चे के प्रति तुम्हारी दयालुता से भरी भावनाएं झलक रही है।


रमा मुन्ने से:- ये लो पैसे चाय के और अपनी दाएं ओर के जेब को मेरी तरफ करों। मैने चुपके से 10-10 के कुछ नोट निकाल उसकी जेब में डाल दिए।


मुन्ना के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दौड़ी और होंठों को हल्के से खोल बोला

मुन्ना:- धन्यवाद आंटी जी!



भाग - ४


मालती:- तुमने इन दिनों बस स्टैंड पर कितना बदलाव देखा है?


रमा:- हां!बुक स्टॉल बढ़ी है। बसों की संख्या के साथ टिकट काउंटर भी बढ़े है। साथ ही विज्ञापन के लिए बड़ी स्क्रीन और पोस्टर भी लगे है।

हां! पर तुमने उस बड़ी सी स्क्रीन पर बॉलीवुड अभिनेता का वह विज्ञापन देखा जिसमें हाथ में सैनेटरी पैड लेकर वह एक पुरुष को अपनी जनानी द्वारा उपयोग में लिए जाने हेतु कहता है।


मालती:- राम! राम! रमा यह कैसी बातें कर रही हो। तुम लोक लाज से तो डरो। मैं तुमसे उम्र में कितनी बड़ी हूं! तुम मुझसे ऐसी बातें कैसे कर सकती हो?


रमा:- हाय! यह ही तो बिडम्बना रही है भारतीय समाज की नारियों की। हमेशा शर्म की चौखट के भीतर ही पली- बढ़ी है। समाज में नारियों को इस प्रकार शोषित किया गया है कि अब बस वे श्वास मात्र लेना ही अपना जीवन समझ बैठी है। अपने हक की बात करते भी वे कतराती है।स्वयं के स्वास्थ्य सम्बन्धी रोगों का खुलासा करते वक्त भी वे झिझकती है। आखिर ऐसी भी क्या शर्म जो प्राण घातक ही सिद्ध हो जाएं।


मालती:-हां! अब तू बदलेगी इस समाज को? दो अक्षर क्या ज्यादा पढ़ लिए समाज को जागरूक करने चली है।अश्लीलता से भरे विज्ञापन को क्या नाम देगी? समाज में उससे क्या संदेश जाएगा?


रमा:- हां! बिल्कुल समाज को जागरूक करना चाहिए।मुझे ही नहीं बल्कि हर उस महिला को समाज को जागरूक करना चाहिए जिन्होंने समाज की बेड़ियों से मुक्त होकर शिक्षा प्राप्त की है। जिस विज्ञापन को तुम अश्लीलता बता रही हो उसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी योजना में शामिल किया है। हमने अपने हक की बात को कभी उठाया ही नहीं। अब तुम्ही देख लो ना। मैं तुम्हें ही उदाहरण के लिए समझा रही हूं और तुम ही मुझ से विद्रोह पर उतरी हो। क्या यह विरोध जायज है?


मालती:- हां! तुमसे पहले भी समाज में कई महिलाएं थी जिन्होंने अच्छी शिक्षा प्राप्त की। परंतु उन्होंने तुम्हारी जैसे उपाधियों का दिखावा कर यूं मुंहफट बाते नही की।


रमा:- यही तो रोना है। अगर वे अपनी शिक्षा का उपयोग सभी महिलाओं को शिक्षित एवम् जागरूक करने में करती तो आज समाज में महिलाओं की स्थिति बेहतर होती।


मालती:- क्या अब भी समाज में नारी की स्थिति दयनीय है?


रमा:- हां! ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं आज भी शिक्षा से वंचित है। वे आज भी अपनी स्वास्थ्य संबधी योजनाओं से वंचित है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं आज भी मासिक धर्म के दौरान एक ही कपड़े का प्रयोग करती है जिसके प्रयोग से उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से कई रोगों का सामना करना पड़ता है। क्या यह सब आज के जमाने में महिलाओं की दयनीय स्थिति को दर्शाने के लिए काफी नही।

आज सरकार व स्वास्थ्य संगठन द्वारा महिलाओं हेतु सैनेटरी पैड के लिए कई जागरूकता अभियान चलाएं जा रहे है। जो स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।


मालती:- क्या इसी के लिए ये विज्ञापन चलाए जा रहे है?


रमा:- हां! हमे हमारे शरीर की साफ-सफाई एवम् रख- रखाव हेतु स्वास्थ्य शिक्षा भी प्रदान की जाती है।इसे पाठयक्रम में जोड़ा गया है। जिसे किसी भी महिला को आपसी बात करने में झिझक नहीं बल्कि वह सबके समक्ष अपनी बात भी रख सकती है।


भाग - ५


मालती:- जीवन में शिक्षा तो जरूरी है। आखिर आज के जमाने में लड़कियों को इतनी छूट जो मिली हुई है। एक वो हमारा जमाना था।


रमा:-हां! परिवर्तन ही समाज की विशिष्ट पहचान है।सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं से महिलाएं लाभप्रद हुई है।महिला शिक्षा को प्रोत्साहन मिला है। सिविल सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। राजनेत्री के रूप में देश का नेतृत्व आज महिलाएं कर रही है।


मालती:- एक बात कहूं तो व्यक्ति को उच्च शिक्षित होना चाहिए। अब तुम ही देखो ना जिस बात को लेकर मैं तुमसे असहज हो रही थी। वह बात तुमने कितने सामान्य तरीके से मेरे समक्ष रख दी है। यह उच्च शिक्षा का ही तो परिणाम है। जिसके फलस्वरूप तुम किसी के भी मन में बैठे भ्रामक अंधकार को अपने ज्ञान से दूर कर सकती हो।


रमा:- हां! उच्च शिक्षित भी नहीं तो साक्षर तो होना ही चाहिए ताकि वह अपने निर्णय ले सके। अपना अच्छा भला जान सके। हां! समाज में महिलाएं अपना नेतृत्व स्वयं कर सके।


मालती:- मेरी छोटी बहिन के इतने उम्दा विचार है।आखिर बहिन किसकी है। अगर तुम गृहणी नहीं होती तो एक अच्छी समाज सुधारक होती।


रमा:-(हंसते हुए) हां! यह आपका बड़प्पन है मैं आपकी ही छत्रछाया में तो रही हूं। आप मेरे गुणों को नहीं पहचानोगे तो और कौन पहचानेगा?


मालती:- (गर्दन आगे की ओर झुका कर) लो ये देखो अपने गांव वाली बस भी आ गई। तुम्हारे आने से पूर्व ही मैंने हम दोनो के टिकट ले लिए थे। चलो चलते है। बस की देरी ने आज मुझे बहुत कुछ सीखा दिया।


रमा:- धन्यवाद! चलो चलते है।

रमा मन ही मन में उत्साहित थी कि उसकी आज की यह यात्रा सफल हो चुकी है। उसने लंबी श्वास खींच मन ही मन में अहसास किया कि एक बार और उसने भ्रम से तम रूपी मन में ज्ञान का दीपक जला उसमे उजाला भर दिया है। इस प्रकार मैने दीपमाला में एक और दीपक जोड़ दिया है।

समाप्त....


★इन्द्राज योगी★