अगर वो मिली मुझे राह में अकेली,

कदमों के प्रवाह से मेरी ओर धकेली,

सहसा!मैं कुछ ना कर पाऊंगा,

देख गुलाबी चेहरा लाल अपना कर जाऊंगा,

नजरों को विचलित कर यहां-वहां टिकाऊंगा,

स्पर्श-सा आभास पा मैं स्तब्ध-सा हो जाऊंगा,

दो कदमों की दूरी में मैं मीलों-सा खो जाऊंगा....


कहो प्रिये!यह बेचैनी कैसी,

तुम पर जब टिके नैन तब ही हाय!

हालत होती मेरी ऐसी,

कहां देखा है मैंने,

निगाह जमा चेहरा तेरा,

हा! डूबा है झीलों से इन नैनों में,

गोताखोर मन मेरा...


आज जो मिली हो,

तुम मुझे इस राह,

क्यों ना हिम्मत बांध,

मैं तुमसे नैन लड़ाऊ,

उलझ कर तुम्हारे केशो के भंवर में,

मैं खुद को मीन-सा छुड़वाऊ....

आ रही क्षणिक दूरी भर से,

उड़ती जुल्फें अहसास करा रही,

अमर पक्षी सा,

क्षणिक-सा ही मैने अनुभव किया,

अमरत्व स्वयं को प्राप्त होने सा,

हो ऐसा की मिले जब दुबारा,

शायद मैं सामना ना कर पाऊं,

पा कर संदेश तेरे आने का,

मैं छुप कर तुझे निहार जाऊं...


शामिल करू मेरी लेखनी मैं,

उस राह को और तुझको,

कानों के ऊपर से संवारती जुल्फों को,

पल-पल झपकती उन पलकों को,

दांतों तले दबे तेरे नाजुक से होंठों को,

कांधे से बार-बार गिरती चूनर को,

पायल में उलझी तेरी सलवार की मोहरी को,

हां!पर तुम मिलती रहना,

उन राहों पर मुझे अकेली....

"इन्द्राज योगी"