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अभी तु क्यों निराश...

अभी तु क्यों निराश है,सम्मुख तेरे सम्पुर्ण संसार है,

जीवन की अवधि है बाकी,कमियाँ बाकी क्षणभर है,

उदास ना हो,हताश ना हो,जीवन पथ पर निराश ना हो,

मंजिल मिलेगी तुझको एक रोज,कर्तव्य पथ पर निराश ना हो,

अभी तु क्यों निराश है...।।1।।


मन-इच्छा शक्ति सबसे शक्तिशाली,

अन्यत्र यहां ना कोई इनसे बलशाली,

इच्छा को प्रबल कर,मन को प्रभावशाली,

तन शक्तिशाली,मन कमजोर,तन कमजोर,मन शक्तिशाली,

अभी तु क्यों निराश है...।।2।।


जोर है केवल एक शब्द मात्र,इसका तु भाव पलट,

मन मे तु उत्साह जगा,प्रमाद-आलस्य को झटक,

मन मे उत्साह का उत्सव उठा,

इच्छाओ मे संकल्प का सामंजस्य बिठा,

देख फ़िर तु उत्साह का महोत्सव बना,

अभी तु क्यों निराश है...।।3।।


विजय श्री कहां इतनी जल्दी वरण करती है,

देने होते है इम्तिहान कई,

उठा के चाहे इतिहास देख लो,

पलटते पन्ने इतिहास के वीरों की जीवन गाथा कहते है,

निराशा को आशा मे बदला,आशावादी रह्ते है,

अभी तु क्यों निराश है...।।4।।


जीवन मे यूँ कोई अनचाहा तु कदम ना उठा,

सब्र की अंगुली पकड़,धैर्य का हाथ थाम,

पराजय यहां कौन ना झेला,विजय श्री ने कईयों को धकेला,

कमियाँ ढूँढ,अवगुण मिटा,देख फ़िर विजय का वरण तेरा,

अभी तु क्यों निराश है...।।5।।


अभ्यास की आदत लगा,आलस्य-प्रमाद देंगे दग़ा,

मेहनत कर मेहनत देख,जीवन मे दृढ़ -संकल्प जगा,

इतिहास के वीरों ने यूहीं,कीर्तिमान नही बनाया,

उपहार स्वरुप मिला नहीं उन्हे,अपने बल-बुते पर बनाया,

अभी तु क्यों निराश है...।।6।।


संसार कद्र करे उसकी,जीत सदा हुई है जिसकी,

जीत को जीत बना,बदल परिभाषा इसकी,

असफलताओ को देखे कौन,पराजित सदा ही रहा मौन,

जीवन के दो पहलु हार-जीत,अब इन्हे समझाए कौन,

अभी तु क्यों निराश है....।।7।।


जीत-हार होती रहे,बनते टूटते कीर्तिमान रहे,

जीवन है जरुरी सबके लिए,परखे ना जीवन इनके तले,

जीत-जीत राग अलापे,जीत से ना कोई संतुष्ट हो पाया,

कुछ और करू,कुछ और करू,इसमे जो था वो भी गवाया,

अभी तु क्यों निराश है...।।8।।


हार का है अपना स्वाद,चखने वाले को ज्ञात है स्वाद,

कडवा है पर सीखपुर्ण है,यह भी जीवन की उप

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