नंगे पाँव, तेज धूप में नापी थी जो गलियाँ..
उन कच्ची गलियों को अब बदलते देख रहा हूँ..
गली का अंत जो लिखता था इबारतें दोस्ती की..
उन इबारतों को मिलते मिट्टी में देख रहा हूँ..
खुले आसमान में लेटकर देखी थी जो ख्वाहिशें..
समय के साथ बदलती उन ख्वाहिशों को देख रहा हूँ..
नादान, नासमझ अठखेलियों से भरा था जो आँगन..
उस आंगन को होते अब सूना देख रहा हूँ..
चुन चुन तिनका जो बनाते थे आशियाना अपना..
उजड़ते परिंदों के उन आशियानों को देख रहा हूँ..
एक बारिश में महक जाता था जो गुलशन हमेशा..
मुरझाए उस गुलशन के हर फूल को देख रहा हूँ..
वो मिट्टी के घरौंदे जिनके कभी मालिक थे हम..
ढ़हती उन घरौंदों की यादों को देख रहा हूँ..
ईद, दीवाली और होली जब मनाते थे एक साथ सब..
खोते उन मोहब्बत भरे दिनो को देख रहा हूँ..