मुहब्बत में न कुछ तो ये हुआ कि,
मुहब्बत की हक़ीक़त जान गया मैं,
बढ़ी खुशियां हमें तो नहीं पता ये,
पर इन आँखों की सुर्ख़ी बढ़ गयी है,
पलकों में कई काँटों की परतें,
एक के एक ऊपर मढ़ गयी है,
हरे जो ज़ख्म थे अब भी हरे हैं,
है बदला ये कि बस स्थान बदलें,
मेरे जज्बात भँवर में झूलते हैं,
ना ही संभले थे कल न अब हैं संभले,
मुहब्बत कुछ नहीं बस शोर है एक,
इसे ख़ामोशी में पहचान गया मैं,
मुहब्बत में न कुछ तो ये हुआ कि,
मुहब्बत की हक़ीक़त जान गया मैं,
- कुमार सोनल


