सोचता हूं, 

कि तुम पर कुछ लिखूं  और तुम पढो 

 

पर 

ये बावली यादें, बेजान साँसे और सूखी आंखे 

कुछ सवाल सा कर जाती हैं 

और सवाल कुछ ऐसे,

जो

तेरी पत्थरदिली और आंखों की दर्पी दिखा जाती हैं 

फ़िर नफ़रतो की आग फ़ूँक जाती हैं 

 

सोचता हूं, 

कि तेरी तस्वीर को पढ़ू और तुम देखो 

 

पर 

ये बिखरे ख्वाब, मुस्काते शबाब और फ़रेबी महताब 

कुछ थप्पड़ सा मार जाते हैं 

और थप्पड़ उन जोरों के 

जो 

तेरे झूठ और खोखलेपन की छाप छोड़ जाते हैं 

फ़िर कराहों की गूंज सुना जाते हैं 

 

सोचता हूं,

कि तुम बेदर्द रहो और मैं इश्क़ करूँ

पर 

इश्क़ के खयालात भी तेरा नाम बताते हैं,

सिर्फ तुझे चिल्लाते हैं .....