बंजारे ही शायद बेहतर हैंदुनियादारी से बेख़बर हैंहम तो आशियाने के पिंजरेके वो परिंदे हैंउड़ना चाहे भी तोखुद के मोह में फँसेअपनी ही दुनिया के सिकंदर हैं