नई सी नाव आज तैयार थी...दौड़ में शामिल होना था...बस  कोशिश में आगे थी.. जोड़ तोड़ से छोटी सी खुद की नजरों में ही ठीक लग रही थी...गांव के तालाब की रौनक थी,प्यार से धन्नो बुलाता था,क्षितिज उसे...क्षितिज के कहने पे तो दौड़ पे आई है..कहता है जीत के लिए तुम ही बनी हो..क्या करती आना पड़ा..क्षितिज की बातें दौड़ने को कहती हैं..
         क्षितिज साथ साथ चल रहा था,मैं तो ना जाने क्या क्या सोचती बड़ी बड़ी नाव..मुझे देखकर मूह बनाते...लकड़ी के नई मशीनें,क्षितिज कहता था इनमे से कुछ समंदर तैर आई हैं...मैं तो अपने तालाब के 10 चक्कर में हि थक जाती हूं..दौड़ शुरू होने में अभी वक्त था,क्षितिज मुझे तैयार करने में लगा था...घंटी बजी लाइन में बुलाया गया,मैं क्षितिज को देखती रही...असहज सी इन बड़ी नावों के बीच..मैंने आंख बंद कर लिया...3.2.1 आंख खोलकर जोर से मैं भी चल पड़ी....100km की दौड़ है सब अपनी रणनीति से आगे बढ़ रहे थे,मुझे दिनभर अपने तालाब में तैरना अच्छा लगता था,आज इन बड़े नावों के बीच असहज महसूस करती हूं....अभी कुछ दूर हि तो चले हैं..झील आज मैंने पहली बार देखा है और क्षितिज के कहने पे चली आई हूं..कितने तेज़ हैं ये नाव...इनकी गति,इनके आत्मविश्वास से सहम जाती हूं...आज तक के सबसे तेज़ गति में हूं मैं..फिर भी इनके सामने कितनी छोटी सी लगती हूं मैं..वापिस मुड़ जाऊं क्या? क्षितिज अब भी किनारे से मेरे साथ साथ चल रहा है..हाथ दिखा दिखा कर अकेले मुझे प्रेरित कर रहा है..कुछ दूर तक दिखा वो मुझे..तब तक मैं जुनून से आगे बढ़ती रही..वो भी कब तक मेरे साथ होता..चलना तो अकेले ही होता है...
    सब त्वरण बढ़ाने लगे उन्हें देखकर मैंने भी गति बढ़ा ली...क्षितिज नही था फिर भी मुझे दिखने लगा उसका हाथ हिलाना मेरा नाम लेना...
    सबसे पीछे थी मैं फिर भी चल रही थी..शायद हार भी जाऊं मैं ...इन नवाचारी मशीनों से....गांव के तालाब में मैने कभी जीतने का सोचा ही नहीं...शायद इसलिए जीत जाती थी मैं...मैं अब भी चल रही थी..मुझ जैसी कइयों ने हार मान ली और लौट गईं..क्षितिज अब भी मेरे साथ चल रहा था..मुझे दिख रहा था...जब भी हारने लगती मेरा मन मुझे मेरे गांव के तालाब में मेरे जीत को याद दिलाता..मैं और फिर चल देती जानते हुए भी की शायद मैं ना जीत पाऊं..क्या क्षितिज को पता था,वो तो जानकर है समंदर भी घूम आया था...क्या वो मुझे हारते हुए देखना चाहता था..मैं तो कहती हूं..मेरा टीके रहना जरूरी है...
मृत्युञ्जय