लाशों के ढेर में इंसान नहीं दिखता गांव का टूटा मकान नहीं  दिखता। उतर के आ गए तारे ज़मीं पर जबसे चांद दिखता है आसमान नहीं दिखता। मिल जाता मुआवजा उसके भी हिस्से का ज़ख्म गहरा है  निशान नहीं दिखता। हो रहें आतुर शहर के चील कौवे राख़  दिखता है शमशान नहीं दिखता। होने न होने में बस फ़र्क है इतना कर्ज़ दिखता है किसान नहीं दिखता।