सबकुछ ठीक है तो ये सवाल क्यों है मेरी ग़ज़ल से इतना बवाल क्यों है हक़ीक़त से है क्यों बैर इतना.. जो है ही नहीं वो कमाल क्यों है दुआ जब एक सज़दे से क़ुबूल हो जाये तो फ़िर एक बकरा हलाल क्यों है कोई ख़ुदा तो कोई राम का कहता है तो फिर सबका ख़ून लाल क्यों है सब कुछ तो है मज़हबी अदालत में फ़िर कुछ न होने का मलाल क्यों है मैंने माना काफ़िर हूँ इस ज़माने में.. तो मेरा हर लिखा एक मिसाल क्यों है