शाम ढलते ही 

एक अजीब सी उलझन का

आपके दिमाग से उतरकर

दिल पे दस्तक दे जाना

अक्सर होता ही होगा

दिन भर काम करके

ये शरीर जितना नहीं थकता

उलझने खामोश होकर भी

आपको न जाने कितनी बार 

थकाकर चूर चूर कर देती हैं।

खुद को समेटने की कोशिश में

न जाने कितने ही शोर

आपको अपना घर बना लेते हैं।

रात को जब आंखें सुस्त होकर

ख़्वाबों में खोने की कोशिश में होती ही हैं कि

कल का डर आपको बार बार जगा देता है।

और, आप यूँ ही तकिए में 

खुद को समेटकर

इस उम्मीद में खो जाते हैं

कि कल सब ठीक हो जाएगा।

कल सब ठीक हो जाएगा। 

©Sahil Mishra