मुझे देश मे अब डर लगता है
बड़ा कठिन ये सफ़र लगता है
हवा जो अब ज़हरीली हो चली है
शायद उसी का ये असर लगता है
मुझे देश मे अब डर लगता है।
जो अपने थे वो किसी गली में खो गएँ
अब बेगाना सा ये शहर लगता है
मुझे देश मे अब डर लगता है।
देशभक्ति जो ज़मीं से कोसो दूर है
ये भक्ति नहीं अवसर लगता है
मुझे देश मे अब डर लगता है।
प्रेम की नदियां मानो सुख गईं हों
अब ये नफ़रत का समंदर लगता है
मुझे देश मे अब डर लगता है।
दिन कट जाते थे एक ही छत के नीचे
अब सूखा हर 'शजर' लगता है
मुझे देश मे अब डर लगता है।
कैसे बचाऊं ख़ुद को अफवाहों के बादल से
जब हर शक्श ही मुझे समर लगता है
मुझे देश मे अब डर लगता है।
कैसे उगाउँ चंद पौधे भाईचारे के
अपना आंगन भी अब बंजर लगता है
मुझे देश मे अब डर लगता है।।