दुनिया की रस्मों से हम दूर हो गए
हम किश्तों में जिये और मशहूर हो गए
माफ़ी की गुंजाइश शायद न के बराबर थी
पर ख़ुदा से बोला और बेक़सूर हो गए
चार कदम ही बढ़े थे जवानी के चौखट से
पलटकर देखा तो बहुत दूर हो गए।
भीड़ से थोड़ी हम अलग क्या हुए
अपने ही लोगों में नामंज़ूर हो गए
करके सब अपना उनकी मोहब्बत के हवाले
उनकी निगाहों में अब हम मज़दूर हो गए