मैंने माँ के अरमानों को चूल्हे में जलते देखा है हाँ मैंने माँ के जज़्बातों को पर्वत से लड़ते देखा है। घूँघट के रस्मों को भी क्या खूब निभाया उसने बेटी से बहु बनने का हर फ़र्ज़ निभाया उसने देर रात सिल्हाने पे आंखों को मलते देखा है हाँ मैंने माँ के आंसुओं को सूरज सा ढलते देखा है। हाँ देखा है मैंने एक प्रेम की मूरत को हाँ देखा है मैंने दया की सूरत को उसके भोले मन मे मैंने दीपक को जलते देखा है हृदय से निर्मल धारा की हिमालय पिघलते देखा है माँ की पीड़ा बस माँ ही जाने जग ने सुनाय जिसे लाखो ताने बचपन का पहला स्वर ही तो माँ होता है माँ माँ कहके ही तो ये तन जवाँ होता है जाने कितनों के हांथों से मैंने माँ के आँचल को जलते देखा है कि चंद रुपयों और अययाशी के खातिर मैंने माँ को मरते देखा है। हाँ मैंने माँ को मरते देखा है