
बांधकर सपनो को मुट्ठी में
मैं शहर की ओर चला।
छोड़कर सभी अपनों को
मैं शहर की ओर चला।
खिलौने भी मैंने छोड़ दिए मैंने
आँगन के किसी कोने में।
वो आम की गुठलियां भी तुम्हें
कहीं दबी मिल जाएँगी।
छोड़कर सभी किस्सों को
घर बार सब छोड़ चला।
बांध कर सपनो को मुट्ठी में
मैं शहर की ओर चला।
आँखों में नमी थीं जो
जाकर सुख रहे थे होंठो पेे।
यूँ ही सिसस्कियाँ लेते हुए
मैं कोसो दूर चला।
बांध कर सपनो को मुट्ठी म
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