बांधकर सपनो को मुट्ठी में
मैं शहर की ओर चला।
छोड़कर सभी अपनों को
मैं शहर की ओर चला।
खिलौने भी मैंने छोड़ दिए मैंने
आँगन के किसी कोने में।
वो आम की गुठलियां भी तुम्हें
कहीं दबी मिल जाएँगी।
छोड़कर सभी किस्सों को
घर बार सब छोड़ चला।
बांध कर सपनो को मुट्ठी में
मैं शहर की ओर चला।
आँखों में नमी थीं जो
जाकर सुख रहे थे होंठो पेे।
यूँ ही सिसस्कियाँ लेते हुए
मैं कोसो दूर चला।
बांध कर सपनो को मुट्ठी में
मैं शहर की ओर चला।
वो मिट्टी की स्लेट
वो कांधे का बस्ता।
वो शैतानियाँ बचपन की
वो कहानियां बचपन की।
कटी पतंग की हांथो में
लेकर उलझा हुआ वो डोर चला।
बांध कर सपनो को मुट्ठी में
मैं शहर की ओर चला ।
नहर में गोते लगाना
शायद शहर में न मिले
वो पगडंडी, वो बगीचा
शायद शहर में न मिले।
छोड़कर यूँ सब चले जाना
अपनी आत्मा को झंकझोर चला
बांध कर सपनो को मुट्ठी मे
मैं शहर की ओर चला।।