मैं नहीं लिखूंगा
हां अब नहीं लिखूंगा
टूटते तारों के बारे में
सर्द रातों के बारे में
सुबह की किरण
महकती फूलों के बारे में
ये सब तेरी याद दिला देते हैं।
मैं नहीं लिखूंगा
बरसते बादल के बारे में
बहती नदी के बारे में
लहरों की धुन
बहती कश्ती के बारे में
ये सब तेरे क़रीब लाते हैं।
मैं नहीं लिखूंगा
किसी गाँव के बारे में
न ही छाँव के बारे में
बदलते नाम
जलते अलाव के बारे में
ये सब तुम्हारी तारीफ़ करते हैं
मैं नहीं लिखूंगा
पुराने गीत के बारे में
किसी भी रीत के बारे में
होली के रंगों की
न ही रमज़ान के बारे में
ये सब मुझे मजबूर करते हैं।
मैं नहीं लिखूंगा
उस आख़री ख़त के बारे में
न तेरी ज़िद के बारे में
न आते कल के बारे में
न बीते कल के बारे में
ये सब अब साजिश सी लगती हैं।


