दुनिया की दस्तूर को मैं सहता चला गया मैं बेबस सा समंदर बहता चला गया जिस शहर से भी गुज़रा मुफलिसी ही दिखी मैं ख्वाबों के महल को ढहता चला गया मैं बेबस सा समंदर बहता चला गया