खेतों में लहराते फसल और हँसता हुआ किसान अरसे बीत गए इनकी  इन्हीं मुस्कान को देखे हुए खेतों से संगीत के बजाए, अब मौत के किससे सुनाई देते हैं अब डर से कोई किसी कोने में नीम का पेड़ भी नहीं लगाता न ही  खेतों के बीच कोई मचान दिखता है। खेतों की पगडंडियों ने जबसे नेताओं के कदम चूमे साहूकारों के कर्ज में डूबे मानों कब्रगाह बन गए हों। पर इन्हीं कब्रगाहों से  आज भी बस एक ही नारा सुनाई देता है  "जय किसान" "जय किसान"