अरसे बाद थक कर सोने का ख़याल आया
हां थोड़ा हंसकर रोने का ख़याल आया ।
खोए थे अबतक न जाने कैसे ख़्वाबों में हम
आंखें खुलीं तो ख़ुद के होने का ख़याल आया।
अंधेरे का पीछा हम बुझते लौ से कर रहे थे
ठोकर लगी तो किसी अपने का ख़याल आया।
बह रहा था दरिया हां उसी के यादों का
अश्क़ों को चखा तो पिरोने का ख़याल आया।