
मैं अपने ही शहर में मेहमान हो गया
जब से मैं हिन्दू और मुसलमान हो गया
मैंने कब्र पर एक चादर क्या चढ़ा दी
मैं शायद शंकर से इरफ़ान हो गया
कहीं शोर तो कहीं मुकदमे की बाते हुईं
मेरा घर से निकलना भी हराम हो गया
कभी राम
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