मैं अपने ही शहर में मेहमान हो गया जब से मैं हिन्दू और मुसलमान हो गया   मैंने कब्र पर एक चादर क्या चढ़ा दी मैं शायद शंकर से इरफ़ान हो गया   कहीं शोर तो  कहीं मुकदमे की बाते हुईं मेरा घर से निकलना भी हराम हो गया   कभी राम तो कभी ख़ुदा की बातें हुईं मज़हबी दफ़्तर में मैं परेशान हो गया   कुछ लोग ऐसे थे जो लार टपका रहे थें. चुनाव आते ही मैं भी  मूल्यवान हो गया     उन्हें ख़बर न थी कि वो एक शायर से भिड़ें हैं मैं भी कभी दिल्ली तो कभी मुल्तान हो गया।